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सरकारी नीतियों को प्रभावित करने में कारगर है मीडिया
सरकारी नीतियों को प्रभावित करने में कारगर है मीडिया

आधुनिक तकनीक से लैस आज की पत्रकारिता सरकारी नीतियों पर पहले से ज्यादा असर डाल रही है। यह असर बहुत तेज और बहुआयामी है। सोशल मीडिया, वेब जर्नलिज्म और न्यूज चैनलों ने अखबारों के साथ मिलकर सरकारी नीतिनिर्माताओं को आम नागरिक की आवाज सुनने पर मजबूर कर दिया है। यह विचारबिंदु आईआईटी कानपुर के `पॉलिसी कॉन्क्लेव-22` के एक वार्ता सत्र में रविवार सुबह 13 फ़रवरी को प्रस्तुत किया गया। संस्थान के `पब्लिक पॉलिसी एंड मीडिया सेल` द्वारा आयोजित इस वार्ता सत्र का विषय था - सरकारी नीतिनिर्धारण पर पत्रकारिता का असर। अमर उजाला के कार्यकारी संपादक और उत्तराखंड के स्टेट हैड संजय अभिज्ञान ने इस विषय पर अपना वक्तव्य छात्र-छात्राओं के सामने रखा।

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कोरोना महामारी से जंग जीतने के आसान उपाय
कोरोना महामारी से जंग जीतने के आसान उपाय

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से सोमवार, 31 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर डॉ सुरभि गुप्ता और आगरा स्थित जिला महिला अस्पताल में मेडिकल काउंसलर डॉ रूबी बघेल ने ‘सेहत है संग तो जीतेंगे हर जंग’ विषय पर विस्तार से चर्चा की। कोरोना महामारी से जंग जीतने के आसान उपायों के बारे में जानकारी देते हुए विशेषज्ञों ने लोगों के सवालों का भी विस्तार से जवाब दिया।

डॉ रूबी बघेल ने बताया कि कोरोना के समय में लोगों में बीमारी से ज्यादा उसका भय देखने को मिल रहा है। कोरोना के सभी रोगियों को मानसिक रूप से मजबूत होना पड़ेगा। घर में परिवार के साथ बातचीत करते रहने से नकारात्मकता दूर होती है।

डॉ सुरभि गुप्ता बताया कि प्री कोरोना, कोरोनाकाल और कोरोना के बाद, इन तीनों स्थितियों में सभी लोगों के लिए बचाव के उपायों (जैसे मास्क पहनना, हाथों की सफाई और सोशल डिस्टेंसिंग) का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। इसके अलावा तीनों ही फेज में सभी लोगों को अपने खान-पान को लेकर विशेष सावधानी बरतने की भी जरूरत है। 

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कोरोना काल में कैसे रखें अपने दिल का ख्याल।
कोरोना काल में कैसे रखें अपने दिल का ख्याल।

कोरोना का वायरस म्यूटेशन के कारण तमाम तरह की समस्याओं को जन्म दे रहा है। संक्रमण की दूसरी लहर में वायरस शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित कर रहा है। इसके चलते संक्रमितों में कई प्रकार के परिवर्तित लक्षण भी देखने को मिल रहे हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि जो लोग कोरोना संक्रमण से ठीक होकर लौट रहे हैं उनमें लॉन्ग कोविड का भी खतरा बना रहता है। कई अध्ययनों में यह भी बताया जा रहा है कि कोरोना का संक्रमण रोगियों के हृदय को भी प्रभावित कर सकता है। इलाज के दौरान या कोरोना से ठीक होने के बाद भी लोगों में कई तरह की हृदय से जुड़ी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से शुक्रवार, 28 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में आईएमएस बीएचयू में कार्डियोलॉजिस्ट प्रोफेसर ओम शंकर ने बताया कि कोरोना काल के दौरान अपने दिल का ख्याल कैसे रखें। इस दौरान डॉ. ओम शंकर ने लोगों के सवालों का भी जवाब दिया।

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कोरोना के कारण आई कमजोरी कैसे दूर करें?
कोरोना के कारण आई कमजोरी कैसे दूर करें?

कोरोना संक्रमण की दूसरी रफ्तार पर अब काफी हद तक काबू पा लिया गया है। संक्रमितों के घटते आंकड़े इस बात के सूचक हैं। हालांकि कोरोना से ठीक हो रहे लोगों में कई दिनों तक गंभीर थकान और कमजोरी की शिकायतें मिल रही हैं। इसको लेकर लोगों के मन में कई तरह से डर भी है। इस लेख में हम जानेंगे कि कोरोना से ठीक होने के बाद किन उपायों के माध्यम से थकान कमजोरी और गंभीर दर्द जैसी समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बृहस्पतिवार, 27 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में दिल्ली एम्स में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमरिंदर सिंह मल्ही ने बताया कि कोरोना के कारण आई कमजोरी कैसे दूर करें। इस दौरान उन्होंने लोगों को कोविड से जल्द रिकवरी करने के महत्वपूर्ण टिप्स भी दिए। साथ ही लोगों के सवालों का जवाब भी दिया।

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यदि कोई कोरोना संक्रमित नहीं हुआ है, तो क्या उसे भी ब्लैक फंगस का खतरा है?
यदि कोई कोरोना संक्रमित नहीं हुआ है, तो क्या उसे भी ब्लैक फंगस का खतरा है?

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर कई तरह से लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। वायरस के म्यूटेशन के कारण न सिर्फ लोगों में इस बार गंभीर लक्षण देखे जा रहे हैं, साथ ही पहली लहर की तुलना में इस बार मौत के आंकड़े भी अधिक रहे हैं। इतना ही नहीं कोरोना के साथ ब्लैक फंगस संक्रमण के बढ़े मामलों ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। कोविड के दौरान जिन लोगों को ज्यादामात्रा में स्टेरॉयड दवाइयां दी गई हैं, उन लोगों में फंगल संक्रमण होने का खतरा अधिक होता है।

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से सोमवार, 24 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में ग्रेटर नोएडा स्थित यथार्थ अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. सुनील बालियान ने कोरोना और ब्लैक फंगस की चुनौतियों एवं समाधान के बारे में जानकारी दी। डॉ. बालियान ने बताया कि अगर किसी शख्स को कोरोना नहीं हुआ तो क्या उसे भी ब्लैक फंगस होने का खतरा है? 

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कोरोना टीका से पहले और बाद में किन बातों का रखें ख्याल
कोरोना टीका से पहले और बाद में किन बातों का रखें ख्याल

कोरोना काल में स्वस्थ रहना सबसे बड़ी चुनौती है। संक्रमण को लेकर लोगों के मन में अनेक सवाल हैं और गलतफहमियां भी। लोगों के सवालों के जवाब जानने और उन्हें जागरूक करने के उद्देश्य से अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा लाइव कार्यक्रम किया जा रहा है। कोरोना से लड़ाई में भले ही टीकाकरण को प्रमुख हथियार माना जा रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में फैली अफवाहों और भ्रांतियों के कारण अभियान कमजोर पड़ रहा है। रविवार, 23 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में नोएडा स्थित फेलिक्स हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. डी. के. गुप्ता ने विस्तार से जानकारी दी कि कोरोना टीका से पहले और बाद में किन बातों का ख्याल रखना जरूरी है।

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क्या शुगर बढ़ा रहा है कोरोना वायरस?
क्या शुगर बढ़ा रहा है कोरोना वायरस?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से शुक्रवार, 21 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में प्रयागराज में नारायण स्वरूप अस्पताल के डॉ. राजीव सिंह ने ‘क्या शुगर बढ़ा रहा है कोरोना वायरस’ विषय पर जानकारी दी। डॉ. राजीव ने बताया कि डायबिटीज से ग्रसित कोरोना के जो मरीज अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं उनमें शुगर के लेवल में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। डायबिटीज के कई रोगी, जिनका सामान्य शुगर लेवल 150-160 रहता था, उनमें भी संक्रमित होने के बाद शुगर का स्तर 400-500 तक देखने को मिला है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में हमें रोगियों को कोरोना के इलाज के साथ इंसुलिन देने की भी जरूरत पड़ रही है। कई ऐसे मरीज भी देखने को मिले हैं जिनको पहले से डायबिटीज की शिकायत नहीं थी लेकिन संक्रमण के चलते उनका शुगर लेवल बढ़ा हुआ पाया गया। इस दौरान डॉ. राजीव सिंह ने लोगों के सवालों का भी जवाब दिया।

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कोरोना और ब्लैक फंगस- चुनौती और समाधान (भाग- 1)
कोरोना और ब्लैक फंगस- चुनौती और समाधान (भाग- 1)

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बृहस्पतिवार, 20 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में वेल्लोर की श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. ऋचा गुप्ता, दिल्ली के वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष जैन, अहमदाबाद के महामारी विशेषज्ञ डॉ. दीपक सक्सेना, लंदन के इमरजेंसी मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. अर्जुन थौर, अहमदाबाद के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. हार्दिक शाह और लंदन के वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सौरभ गोयल ने कोरोना और ब्लैक फंगस की चुनौतियों एवं समाधान के बारे में विस्तार से चर्चा की। इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि यदि कोई व्यक्ति इन खौफनाक बीमारियों की चपेट में आ गया है, तो वह अपना बचाव कैसे कर सकता है। लाइव कार्यक्रम के दैरान विशेषज्ञों ने लोगों के सवालों का भी जवाब दिया।

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कोरोना और ब्लैक फंगस- चुनौती और समाधान (भाग- 2)
कोरोना और ब्लैक फंगस- चुनौती और समाधान (भाग- 2)

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बृहस्पतिवार, 20 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में वेल्लोर की श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. ऋचा गुप्ता, दिल्ली के वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष जैन, अहमदाबाद के महामारी विशेषज्ञ डॉ. दीपक सक्सेना, लंदन के इमरजेंसी मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. अर्जुन थौर, अहमदाबाद के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. हार्दिक शाह और लंदन के वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सौरभ गोयल ने कोरोना और ब्लैक फंगस की चुनौतियों एवं समाधान के बारे में विस्तार से चर्चा की। इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि यदि कोई व्यक्ति इन खौफनाक बीमारियों की चपेट में आ गया है, तो वह अपना बचाव कैसे कर सकता है। लाइव कार्यक्रम के दैरान विशेषज्ञों ने लोगों के सवालों का भी जवाब दिया।

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किस ब्लड ग्रुप वालों को कोरोना से ज्यादा खतरा?
किस ब्लड ग्रुप वालों को कोरोना से ज्यादा खतरा?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बुधवार, 12 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में अपोलो अस्पताल में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. मनीष और पटना में आईजीआईएमएस अस्पताल के डॉ. अमीष कुमार ने बताया कि किस ब्लड ग्रुप वाले को कोरोना से ज्यादा खतरा है।

कोरोना वायरस को दुनिया में आए लगभग डेढ़ साल हो चुके हैं और तभी से दुनियाभर के वैज्ञानिक इसपर शोध कर रहे हैं, जिसमें नई-नई बातें निकल कर सामने आ रही हैं। हाल ही में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च यानी सीएसआईआर ने कोरोना वायरस और ब्लड ग्रुप के बीच के संबंधों को लेकर एक सर्वे किया और उसके नतीजे प्रकाशित किए। इस सर्वे के मुताबिक, एबी और बी ब्लड ग्रुप वाले लोग अन्य ब्लड ग्रुप की तुलना में कोरोना संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, यानी ऐसे लोगों को कोरोना वायरस ज्यादा प्रभावित कर रहा है।

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कोरोना और हैप्पी हाइपोक्सिया के बीच कनेक्शन?
कोरोना और हैप्पी हाइपोक्सिया के बीच कनेक्शन?

कोरोना संक्रमितों के मामले देश में लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कई गंभीर रोगियों में कोरोना की इस दूसरी लहर में सांस लेने में तकलीफ और ऑक्सीजन के स्तर में गिरावट के मामले देखने को मिल रहे हैं। शरीर में ऑक्सीजन की कमी कोरोना की गंभीरता के साथ कई अन्य तरह से भी लोगों के लिए खतरनाक हो सकती है। हैप्पी हाइपोक्सिया ऐसी ही एक गंभीर समस्या है, जिसके मामले कोरोना के समय में काफी बढ़ रहे हैं।

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से मंगलवार, 11 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में इंदौर स्थित एमवाय अस्पताल के चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. दिलीप सिंह चावड़ा और दिल्ली एम्स के डॉ. राजीव रंजन (एमडी, लैब मेडिसिन) ने कोरोना और हैप्पी हाइपोक्सिया पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान विशेषज्ञों ने लोगों के सवालों का भी जवाब दिया।

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कोरोना के बाद आई कमजोरी कैसे दूर करें?
कोरोना के बाद आई कमजोरी कैसे दूर करें?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बृहस्पतिवार, 6 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में दिल्ली एम्स के पैथोलॉजिस्ट डॉ. आमोद कुमार और उजाला सिग्नस सोनीपत के डॉ. गौरव कामरा ने विस्तार से बताया कि कोरोना के बाद आई कमजोरी कैसे दूर करें? कोरोना से रिकवरी के बाद लोगों को हो रही कमजोरी को दूर करने को लेकर डॉ गौरव कहते हैं कि ऐसे लोगों को सबसे पहले संतुलित और पौष्टिक आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा व्यायाम, विशेषकर सांस लेने और छोड़ने वाले व्यायामों को जरूर करना चाहिए। लोगों को रोजाना 10 से 15 मिनट तक मुंह बंद करके लंबी सांस लेने का अभ्यास करना चाहिए। इस दौरान विशेषज्ञों ने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।

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कोरोना के ये लक्षण दिखें तो अस्पताल जरूर जाएं।
कोरोना के ये लक्षण दिखें तो अस्पताल जरूर जाएं।

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बुधवार, 5 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में एनएमसीएच पटना के डॉ. मुकुल कुमार सिंह ने बताया कि देश में कोरोना का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। संक्रमण का असर इस बार ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहा है, जो ज्यादा चिंता का विषय है। कोविड के नए स्ट्रेनों के कारण दूसरी लहर में लोगों को तमाम तरह की दिक्कतें हो रही हैं। सत्र के दौरान उन्होंने बताया कि कोरोना के कौन से लक्षण दिखने पर अस्पताल जाने की जरूरत है। इस दौरान उन्होंने लोगों के सवालों का भी जवाब दिया।

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कोरोना का नया म्यूटेंट कितना खतरनाक?
कोरोना का नया म्यूटेंट कितना खतरनाक?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से मंगलवार, 4 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में कार्यरत डॉ. आयशी पाल ने विस्तार से बताया कि कोरोना का नया म्यूटेंट कितना खतरनाक है। डॉ. आयशी पाल ने बताया कि सिर्फ कोरोना ही नहीं, हर वायरस म्यूटेशन करता है। देश में हाल के दिनों में सबसे ज्यादा यूके स्ट्रेन के वायरस से होने वाले संक्रमण के मामले देखने को मिले हैं। कोरोना के म्यूटेंट वायरस को इसलिए ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है क्योंकि इसमें लोगों को सांस लेने की दिक्कत महसूस हो रही है, जबकि पिछले साल वाले वायरस में लोगों को सिर्फ बुखार और खांसी जैसी दिक्कतें ही हो रही थीं। इस दौरान डॉ. आयशी ने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।

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गर्भवती महिलाओं को संक्रमण से ज्यादा खतरा क्यों?
गर्भवती महिलाओं को संक्रमण से ज्यादा खतरा क्यों?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से सोमवार, 3 मई, 2021 को कोरोना जागरूकता अभियान के तहत आयोजित लाइव कार्यक्रम में आईजीआईएमएस पटना के डॉ. अमीष कुमार और महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. वैशाली शर्मा ने बताया कि गर्भवती महिलाओं को संक्रमण से ज्यादा खतरा क्यों? डॉ वैशाली बताती हैं कि कोरोना की पहली लहर गर्भवती महिलाओं के लिए उतना खतरनाक नहीं था जितना यह दूसरी लहर है। कोरोना के म्यूटेंट वायरस के कारण गर्भवती महिलाओं में बहुत ही गंभीर संक्रमण देखने को मिल रहे हैं। गर्भावस्था के दौरान शरीर के इम्यून सिस्टम में कई तरह के बदलाव होते हैं जिसके कारण ऐसी महिलाओं में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस दौरान विशेषज्ञों ने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।

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कोरोना की दूसरी लहर और मानसिक तनाव
कोरोना की दूसरी लहर और मानसिक तनाव

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से आयोजित कोरोना जागरूकता अभियान लाइव कार्यक्रम के तहत शनिवार, 1 मई, 2021 को दिल्ली एम्स की डॉ. निष्ठा कपिल और मनोवैज्ञानिक डॉ. दीपाली बत्रा ने ‘कोरोना की दूसरी लहर और मानसिक तनाव से कैसे दूर रहें’ नामक विषय पर विस्तार से चर्चा की। विशेषज्ञों ने कोरोना के कारण लोगों के मानसिक सेहत पर पड़ रहे असर के बारे में बताया। इस दौरान मनोवैज्ञानिक डॉ दीपाली बत्रा और दिल्ली एम्स की डॉ. निष्ठा कपिल ने इस समस्या से बचने के उपायों के बारे में लोगों को बताया। इस दौरान दिल्ली एम्स की डॉ. निष्ठा कपिल और मनोवैज्ञानिक डॉ. दीपाली बत्रा ने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।

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कोरोना के इलाज में होम्योपैथी कितनी कारगर?
कोरोना के इलाज में होम्योपैथी कितनी कारगर?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से आयोजित कोरोना जागरूकता अभियान लाइव कार्यक्रम के तहत शुक्रवार, 30 अप्रैल, 2021 को एमडी (होम्योपैथी) डॉ. गुनीत सिंह गाबा ने बताया कि कोरोना के इलाज में होम्योपैथी कितनी कारगर है? डॉ. गुनीत ने लोगों के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि हमेशा मुश्किल समय में होम्योपैथी ने लोगों की मदद की है। कोरोना के मामले में भी यह उपचार पद्धति प्रभावी परिणाम दे सकती है। कोविड होने से पहले, कोविड के दौरान और कोविड होने के बाद भी होम्योपैथी आपको बेहतर परिणाम दे सकती है। बहुत सारे गंभीर रोगियों को होम्योपैथिक उपचार से लाभ भी मिला है। हालांकि इस समय सोशल मीडिया में कई सारी होम्योपैथिक दवाओं के बारे में चर्चा हो रही है, उनपर भरोसा न करें। किसी भी दवा को लेने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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जानें घर पर भी मास्क पहनना क्यों है जरूरी?
जानें घर पर भी मास्क पहनना क्यों है जरूरी?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से आयोजित कोरोना जागरूकता अभियान के तहत बृहस्पतिवार, 29 अप्रैल, 2021 को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के डिपार्टमेंट ऑफ हेमेटोलॉजी के डॉ. जयस्तु सेनापति ने बताया कि घर पर भी मास्क पहनना क्यों जरूरी है। डॉ. जयस्तु कहते हैं कि जब कोई वायरल संक्रमण विकराल रूप ले लेता है तो बहुत सारे लोगों में इसके लक्षण देखने को मिल सकते हैं। कई लोग ऐसे भी होते हैं जो संक्रमित तो होते हैं लेकिन उनमें लक्षण नजर नहीं आते हैं उन्हें एसिम्टोमैटिक कहा जाता है। आपके घर में भी ऐसे लोग हो सकते हैं जो बाहर जाकर काम करते हैं, संभव है कि जब वो घर वापस आ रहे हों तो उनके साथ यह वायरस भी घर पर आ जाए। ऐसे में लोगों के लिए घर में मास्क पहनना जरूरी हो जाता है। इस दौरान डॉ. सेनापति ने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।

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कितनी मात्रा में किया जाना चाहिए काढ़े का सेवन?
कितनी मात्रा में किया जाना चाहिए काढ़े का सेवन?

कोरोना महामारी से सुरक्षित रहने के लिए बचाव को ही विशेषज्ञ सबसे बेहतर उपाय मानते हैं। लोगों से बार-बार मास्क लगाने, हाथों को धोते रहने और भीड़भाड़ वाली जगहों पर न जाने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा आहार में विटामिन सी और डी के साथ जिंक के सेवन और दिन में दो से तीन बार काढ़ा पीने को भी काफी फायदेमंद माना जाता है। हालांकि कई रिपोर्ट्स में ऐसा दावा किया जा रहा है कि काढ़े का ज्यादा सेवन करना लिवर के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

अमर उजाला फाउंडेशन कोरोना जागरूकता अभियान के तहत मंगलवार, 26 अप्रैल, 2021 को आयोजित लाइव कार्यक्रम में दिल्ली एम्स के डॉ. राजीव रंजन ने काढ़े के सही इस्तेमाल के बारे में जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने लोगों के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि काढ़े के ज्यादा सेवन से लिवर को नुकसान भी हो सकता है।

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सामान्य जुकाम और कोरोना की पहचान कैसे करें?
सामान्य जुकाम और कोरोना की पहचान कैसे करें?

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से कोरोना जागरूकता अभियान के तहत शनिवार, 24 अप्रैल, 2021 को आयोजित लाइव कार्यक्रम में एम्स के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन के एमडी डॉ. आर्यभट्ट साधु, उजाला सिग्नस के डॉ. निर्दोष छाबड़ा (एमबीबीएस मेडिसिन) और प्रयागराज के जहांगीर हॉस्पिटल के डॉ. अलताफ अहमद ने कोरोना से संबंधित लोगों के सवालों के जवाब दिए। इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि ‘सामान्य जुकाम और कोरोना की पहचान कैसे करें?’ इसके अलावा वायरस की चपेट में आने पर आप क्या करें, क्या न करें। कौन-कौन सी चीजें आपको नुकसान पहुंचा सकती हैं और कौन सी फायदेमंद हैं।

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कोरोना के नए स्ट्रेन से क्यों बढ़ती है सांस की दिक्कत?
कोरोना के नए स्ट्रेन से क्यों बढ़ती है सांस की दिक्कत?

कोरोना महामारी के दौर में स्वस्थ रहना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए अमर उजाला फाउंडेशन की पहल पर कोरोना जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। बुधवार, 21 अप्रैल, 2021 को आयोजित लाइव कार्यक्रम के तहत नोएडा एंटी कोरोना टास्क फोर्स के डॉ. सिद्धार्थ गुप्ता और कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष सिंघल ने बताया कि कोरोना का नया स्ट्रेन शक्तिशाली है, फेफड़ों में तेजी से हमला कर रहा है ये वायरस। चिकित्सकों ने बताया कि वायरस की चपेट में आने पर आप क्या करें, क्या न करें। कौन-कौन सी चीजें आपको नुकसान पहुंचा सकती हैं और कौन सी फायदेमंद हैं। इस दौरान विशेषज्ञों ने कोरोना से संबंधित सवालों के जवाब भी दिए।

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AUF नज़रिया | हौसलों की उड़ान | जीव बसेरा | राखी किशोर
AUF नज़रिया | हौसलों की उड़ान | जीव बसेरा | राखी किशोर

नज़रिया श्रृंखला के तहत अमर उजाला फाउंडेशन पेश कर रहा है ऐसे लोगों की छोटी कहानियां जिनकी जिंदगी ने जमीनी हकीकत की स्लेट पर उनके हौसले से लिखा है उनका नज़रिया... ये बातें हैं उनकी जिन्होंने खुद को इतना समर्थ बनाया है कि अपने दम पर अपनी जिद और सपनों की मंजिल तय कर सकें। हालात का रोना रोने के बजाय अपनी सामर्थ्य भर खुद हालात बदलने की कोशिश करते चलें.. खुशियां बिखरते चलें..

मौजूदा समय में ज्यादातर लोग गली-मोहल्ले के कुत्तों से हैरान-परेशान हैं, कुछ तो आतंक का पर्याय देते हुए मारने से भी गुरेज नहीं करते और खुद को पशु प्रेमी कहते हैं। आवारा कुत्ते कहकर लोग इसे बड़ी चुनौती बताते हैं और भेदभाव करते हैं। अपने घर के पालतू जानवरों को तो लोग बहुत प्यार करते हैं, लेकिन सामुदायिक पशुओं के बारे में बहुत कम लोग सोच पाते हैं। एनिमल लवर एवं स्ट्रे डॉग्स की देखभाल की असली मसाल पेस कर रहा है लखनऊ के हसनगंज में स्थित जीव बसेरा..

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मानसिक दिव्यांगता से प्रभावित इंसान खुद अपने काबू में नहीं होता | AUF नज़रिया | निर्वाण केंद्र लखनऊ
मानसिक दिव्यांगता से प्रभावित इंसान खुद अपने काबू में नहीं होता | AUF नज़रिया | निर्वाण केंद्र लखनऊ

नज़रिया श्रृंखला के तहत अमर उजाला फाउंडेशन पेश कर रहा है ऐसे लोगों की छोटी कहानियां जिनकी जिंदगी ने जमीनी हकीकत की स्लेट पर उनके हौसले से लिखा है उनका नज़रिया... ये बातें हैं उनकी जिन्होंने खुद को इतना समर्थ बनाया है कि अपने दम पर अपनी जिद और सपनों की मंजिल तय कर सकें। हालात का रोना रोने के बजाय अपनी सामर्थ्य भर खुद हालात बदलने की कोशिश करते चलें.. खुशियां बिखरते चलें..

मानसिक दिव्यांगता एक ऐसी चुनौती है, जिससे प्रभावित इंसान खुद अपने काबू में नहीं होता। अपनी देखभाल खुद नहीं कर पाता। ऐसे व्यक्ति को ऐसी देख-रेख की जरुरत होती है, जिसमें उसे माँ जैसी सतर्क और पूरी तरह से जिम्मेदार ममता मिलती रहे लगातार। ऐसी ही कोशिश कर रहा है लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके के तकरोही में स्थित निर्वाण केंद्र..

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हिंदी हैं हम | आइए...मातृभाषा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के अभियान का हिस्सा बनें
हिंदी हैं हम | आइए...मातृभाषा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के अभियान का हिस्सा बनें

मातृभाषा से दोस्ती एक कृतज्ञ समाज की जरूरत होती है और इसी कड़ी में अमर उजाला की तरफ से एक विनम्र कोशिश है 'हिंदी हैं हम'। मातृभाषा से दिल का रिश्ता हो तो हमारी संवेदनाओं को पंख मिलते हैं, सपनों को उड़ान मिलती है और हमें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए मिलते हैं शब्द।

अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान का शुभारंभ किया है। यह एक ऐसा मंच होगा, जिससे जुड़कर हमारे पाठक मातृभाषा को और समृद्धशाली बना सकते हैं।

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हिंदी हैं हम | अपनों की भाषा... सपनों की भाषा | हिंदी पढ़े | हिंदी बोलें | हिंदी सीखें | गर्व करें
हिंदी हैं हम | अपनों की भाषा... सपनों की भाषा | हिंदी पढ़े | हिंदी बोलें | हिंदी सीखें | गर्व करें

मातृभाषा से दोस्ती एक कृतज्ञ समाज की जरूरत होती है और इसी कड़ी में अमर उजाला की तरफ से एक विनम्र कोशिश है 'हिंदी हैं हम'। मातृभाषा से दिल का रिश्ता हो तो हमारी संवेदनाओं को पंख मिलते हैं, सपनों को उड़ान मिलती है और हमें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए मिलते हैं शब्द।

अमर उजाला के पाठकों के लिए 'हिंदी हैं हम' एक ऐसा मंच है, जहां हम सब मिलकर लिख सकते हैं उम्मीद की एक नई वर्णमाला। इससे जुड़कर आप अपनी मातृभाषा से प्रेम का परिचय दे सकते हैं, अपने शब्द सामर्थ्य से सबका दिल जीत सकते हैं। इसका हिस्सा बनने के लिए आपको बस 30 सेकंड का अपना वीडियो रिकॉर्ड करके भेजना है।

इस अभियान में बच्चे जुड़ सकते हैं, युवा भी हिस्सा ले सकते हैं। दादा-दादियों और नाना-नानियों का भी स्वागत है। बड़ों की मदद से बच्चे रिकॉर्डिंग करें और अपने दादा-दादी या नाना-नानी की मदद भी करें। ये वीडियो आप हमारे व्हाट्सएप नंबर पर भेजें (9711616205) या ऑनलाइन अपलोड करें। हर वर्ग में हर हफ्ते प्रमाणपत्र और किताबों सहित उपहार घोषित होंगे। श्रृंखला पूरे छह सप्ताह चलेगी। चुने हुए प्रतिभागियों को हिंदी माह सितंबर के दौरान मातृभाषा पर विशेष वेबिनार में हिस्सा लेने का मौका मिलेगा और वे अमर उजाला अभियान के विशेष साथी नामित होंगे।

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14 June- विश्व रक्तदाता दिवस | दीजिए जिंदगी का उपहार
14 June- विश्व रक्तदाता दिवस | दीजिए जिंदगी का उपहार

रविवार यानि 14 जून, 2020 को विश्व रक्तदाता दिवस के अवसर पर अमर उजाला फाउंडेशन की अनूठी पहल रक्तदान-महादान के तहत उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के विभिन्न शहरों में स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इन शिविरों का आयोजन 14 जून से 30 जून तक जारी रहेगा। इस वर्ष यह मुहिम कोरोना योद्धाओं को समर्पित है।

आओ करें रक्तदान, हो स्वस्थ भारत का निर्माण
कोविड- 19 के चलते उत्पन्न वैश्विक स्वास्थ्य संकट को ध्यान में रखते हुए सभी शिविरों में तमाम सुरक्षा व्यवस्था जैसे कि दो गज देह से दूरी, मास्क का प्रयोग, सैनिटाइजेशन आदि का विशेष ध्यान रखा जाएगा। 

शिविर में स्थानीय जिला अस्पताल के ब्लड बैंक की टीम मौजूद रहेगी। इस दौरान एकत्र किए गए रक्त को जिला अस्पताल में संचित किया जाएगा और जरूरतमंद लोगों की मदद की जाएगी। यदि आप स्वस्थ महसूस कर रहे हैं तो आप भी रक्तदान कर सकते हैं, इससे शरीर में कोई कमजोरी नहीं आती है। रक्तदान करके देखिए, अच्छा लगता है।

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अतुल माहेश्वरी छात्रवृत्ति- 2019 के विजेताओं को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया सम्मानित।
अतुल माहेश्वरी छात्रवृत्ति- 2019 के विजेताओं को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया सम्मानित।

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने शुक्रवार, 7 फरवरी, 2020 को संसद भवन परिसर में अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से दी जाने वाली अतुल माहेश्वरी छात्रवृति 2019  के विजेताओं को सम्मानित किया। इस छात्रवृति के लिए 36 सामान्य और दो विशेष छात्रों का चयन किया गया है।

लोकसभा स्पीकर ने बच्चों से मुलाकात में कहा कि अमर उजाला परिवार को बधाई देता हूं जिसने बच्चों को देश के लोकतंत्र केसबसे बड़े मंदिर(संसद भवन) को दिखाने का सौभाग्य दिया। उन्होंने बच्चों को बताया कि भारतीय संसद का इतिहास काफी लंबा है यह आजादी से पहले का भी है और आजादी के बाद का भी। इसलिए बच्चों को इस इतिहास से जरुरत परिचित कराना चाहिए। उन्होंने बच्चों को संसद की कार्यवाही देखने के लिए कहा जिससे कि लोकतंत्र केप्रति उनका विश्वास बढ़े।

अतुल माहेश्वरी छात्रवृति 2019 पाने वालों बच्चों को पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उतराखंड, जम्मू-कश्मीर, व उत्तर प्रदेश से चयनित किया गया है। इस छात्रवृति केतहत नौवीं से दसवीं केबच्चों को 30 हजार रुपये की राशि व 11वीं से बारहवीं तक केबच्चों को 50 हजार रुपये की राशि प्रदान की जाती है।

#AtulMaheshwariScholarship #LokSabhaSpeakerOmBirla #AMC #CSR

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स्मार्ट बेटियां | परिवार के संघर्ष का कर्ज अदा करने के बाद शादीः शबीना
स्मार्ट बेटियां | परिवार के संघर्ष का कर्ज अदा करने के बाद शादीः शबीना

पिता जिस तरह हाड़तोड़ मेहनत कर अपने बच्चों को पढ़ाने के  लिए पैसे जुटा रहे हैं उसे देख सबीना का दिल मसोस उठता था। घर की आमदनी का जरिया मजूरी ही है। इस संघर्ष के बीच बड़ी हो रही सबीना ने भी ठान रखा है कि अच्छी पढ़ाई करके शिक्षक बनेगी और माता-पिता से संघर्ष का कुछ कर्ज अदा करके ही शादी की बात सोचेगी।

श्रावस्ती के कटहा गांव की सबीना के पिता मजदूरी के लिए घर से दूर रहते हैं। जिस आर्थिक संघर्ष के बीच सबीना की पढ़ाई चल रही है, उसने सबीना में एक अलग ही तरह की समझ और मजबूती पैदा की है। उसके दिमाग में साफ है कि पढ़-लिख कर उसे शिक्षिका बनना है, माता-पिता के संघर्षों का कुछ-न-कुछ कर्ज उतारना है। घर वालों ने भी उसे अच्छी पढ़ाई करने से किसी प्रकार से रोका नहीं है। तीन बहनों और तीन भाइयों के साथ ही परिवार में एक भाभी भी हैं और मां का लगातार साया है।

सबीना कहती है बाल विवाह को रोकना भी माता-पिता का नाम रोशन करने का ही एक तरीका है। अपनी साफ सोच के साथ आगे बढ़ रही है सबीना।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी श्वेता राव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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नज़रिया- जो जीवन बदल दे | चंडीगढ़ | अमर उजाला फाउंडेशन
नज़रिया- जो जीवन बदल दे | चंडीगढ़ | अमर उजाला फाउंडेशन

अमर उजाला आपके लिए लेकर आया है "नज़रिया- जो जीवन बदल दे" विचारो को उत्तेजित करने वाली वार्ताओं की एक श्रृंखला , उन लोगो द्वारा जो अपने विचारों द्वारा समाज में परिवर्तन लाए हैं। संवाद के इस कार्यक्रम में आपसे रू-ब-रू होंगे विचार नायक, खुद अपनी लीक और कर्म बनाने वाले विशेषज्ञ जो आपकी ज़िन्दगी को बहुत गहराई से परिभाषित करने वाले मुद्दों पर अपनी अनुभव-पुष्ट बात बेबाकी से प्रस्तुत करेंगे । नजरिया का तीसरा संस्करण मंगलवार, 17 सितंबर, 2019, दोपहर 3.30 बजे से भार्गव ऑडिटोरियम, पीजीआई, सेक्टर 12, चंडीगढ़ में आयोजित किया जाएगा।

Amar ujala Foundation brings to you "Nazariya Jo Jeevan Badal De" a series of thought provoking talks by people who have brought about change though the power of ideas and action. These talks will bring together thought leaders, idea mavens and youth icons under one roof to do a deep exploration at the most important ideas of today. The third edition of this series shall be hosted on Tuesday, September 17, 2019, 3.30 pm onwards, Bhargava Auditorium, PGI, Sector 12, Chandigarh.

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विश्व रक्तदाता दिवस | 14 जून | 100 से अधिक शहरों में स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन
विश्व रक्तदाता दिवस | 14 जून | 100 से अधिक शहरों में स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन

अमर उजाला फाउंडेशन के आह्वान पर विश्व रक्तदाता दिवस के अवसर पर शुक्रवार, 14 जून, 2019 को देश के 100 से अधिक शहरों में महादानियों का महामेला लगने जा रहा है। हर साल की तरह इस साल भी अमर उजाला फाउंडेशन अपने प्रसार वाले राज्यों में स्वैच्छिक रक्तदान शिविर लगाने जा रहा है। उत्तर प्रदेश हो, हिमाचल प्रदेश हो, उत्तराखंड हो या फिर हरियाणा या चंडीगढ़ सभी जगह रक्तदानियों में इस रक्तदान कैंप को लेकर भारी उत्साह है। इन रक्तदान कैंपों में जो भी रक्त एकत्रित होता है, उसे सरकारी अस्पतालों के ब्लड बैंकों में दिया जाता है।

इन कैंपों में अधिक से अधिक लोग पहुंचे इसकी तैयारी जोर-शोर से की जा रही है। इसमें समाज का हर वर्ग जुड़ता है और अपनी सेवाएं देता है। देश के अलग-अलग प्रांतों में इन कैपों से सरकारी मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, समाजिक संगठन, और रेडक्रॉस सोसाइटी भी जुड़ रही हैं।

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सतर्क भाई की समझ से रुका कंचन का बाल विवाह | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
सतर्क भाई की समझ से रुका कंचन का बाल विवाह | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

अशोक की समझदारी और सतर्कता के चलते उसकी छोटी बहन की कच्ची उम्र में ही ब्याह दिये जाने से बच गयी और उसकी पढ़ाई भी जारी रह सकी। नौकरी से सिलसिले में अपने गांव दसियापुर से बाहर रहने के बावजूद अशोक को समय रहते पता चल गया था कि छोटी बहन कंचन की शादी की बात घर में शुरू हो गयी है। कम उम्र में शादी उसकी पूरी जिंदगी के साथ खिलवाड़ हो जाएगा, मां से यह कहकर अशोक ने शादी की बात को आगे बढ़ने से रुकवा दिया।

ग्यारहवीं में पढ़ रही 18 साल की कंचन को इस बात की बेहद खुशी है कि बड़े भाई ने घर में ठीक से बात करके उसकी पढ़ाई भी जारी रखवाई और कच्ची उम्र में शादी से भी उसे बचा लिया। अशोक ने घर वालों को इस बात के लिए भी राजी किया कि जबतक कंचन अच्छे से पढ़-लिख कर कुछ बन न जाए, उसकी समझ में परिपक्वता न आ जाए, तबतक उसे शादी के बंधन में बांधने की जिद न की जाए। अपने इस समझदार भाई की मजबूत मदद ने कंचन को अपनी जिंदगी को एक सही मुकाम पर ले जाने की कोशिश करने की गुंजाइश हासिल करा दी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी शशि शुक्ला ने अशोक और कंचन से विस्तार से बात करके यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां |  बड़ी को बचपन में ब्याहना पड़ा पर छोटी को बचाएगी रामरानी
स्मार्ट बेटियां | बड़ी को बचपन में ब्याहना पड़ा पर छोटी को बचाएगी रामरानी

दामू पुरवा गांव की आशा बहू रामरानी के चेहरे पर पश्चाताप साफ नजर आता है। वह बताती हैं कि आज वह दुनिया को बाल विवाह के खतरों के बारे में समझाती हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा था जब वह खुद अपनी बड़ी बेटी के बाल विवाह को रोक नहीं पाईं। श्रावस्ती जिले के जमुनहा ब्लॉक के इस गांव में बाल विवाह एक आम बात है। वैसे पूरा श्रावस्ती जिला ही बाल विवाह की सबसे ऊंची दर के लिए देश भर में कुख्यात है।

रामरानी बताती हैं कि उनके पति ने जब बड़ी बेटी को सोलह साल की उम्र में ब्याहा तो उनमें इतनी समझ और हिम्मत नहीं थी कि वे इसे रोकें। उसका अंजाम यह हुआ कि उन्होंने बाद में अपनी बेटी को गृहस्‍थी की चक्की में फंसते और बरबाद होते देखा। उसकी सेहत, आत्म सम्मान, शिक्षा, आय - सब पर बाल विवाह के कुप्रभाव हुए। लेकिन मां होने के बावजूद वह बस चुपचाप देखने के सिवा कुछ नहीं कर पाई।

इसलिए अब रामरानी कृतसंकल्प हैं। वह अपनी छोटी बेटी की तालीम हर हाल में पूरा करेंगी। इस बीच रामरानी ने सोशल हेल्‍थ वर्कर की ट्रेनिंग भी ले ली है और आशा बहू बन गईं हैं। घर-घर जाकर जच्चा-बच्चा की सेहत के गुर समझाती हैं।

एक मां के पश्चाताप की यह कहानी बिलकुल सच्ची है और इसे अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी पिंकी देवी ने वीडियो कथा के रूप में ढाल कर भेजा है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | प्रधानमंत्री भले न बन पाए पर अब आज़ाद है उर्मिला
स्मार्ट बेटियां | प्रधानमंत्री भले न बन पाए पर अब आज़ाद है उर्मिला

अतीत चाहे कितना ही घायल हो और वर्तमान कितना ही संघर्षपूर्ण, लेकिन भविष्य के सपने हमेशा गुलाबी होने चाहिए। उर्मिला शुक्ला की सच्ची कहानी हमें यही सबक देती है। उर्मिला कुछ समय पहले ही बाल विवाह से बाल-बाल बची थी। अभी उसने प्राइवेट से बीए का फार्म ही भरा है और ग्रेजुएट बनने से कुछ दूर है। लेकिन उसका सपना एक दिन प्रधानमंत्री बनने का है। वह कहती हैं कि राजनीति में उसकी बड़ी रुचि है।

बाल विवाह की ऊंची दर के लिए बदनाम श्रावस्ती जिले के इकौना ब्लॉक के बगनहा गांव की निवासी उर्मिला बताती हैं कि जब वह हाईस्कूल में थीं और जब उनकी उम्र बमुश्किल सोलह साल थी, तब उन्हें पड़ोसियों से पता चला कि उसकी शादी की तैयारी चल रही है। दुखी और निराश उर्मिला ने मां-बाप को समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन किसी ने उर्मिला के आंसू नहीं पोंछे।

आखिर में उर्मिला ने पड़ोस में रहने वाले अंकल-आंटी को अपना हमदर्द बनाया। उन्हें बताया कि कैसे वह शादी के लिए कतई तैयार नहीं है। अंकल आंटी समझदार थे। उन्होने उर्मिला के परिवार को समझाने का बीड़ा उठाया। कई दिन की समझाइश के बाद आखिरकार उर्मिला की शादी टल गई।

अब उर्मिला के सपने फिर से जिंदा हो गए हैं। उसने सिलाई-कढ़ाई सीखना आरंभ किया है। बीए की पढ़ाई चल ही रही है। उससे उसकी आपबीती पूछो तो वह हाथ जोड़कर सबसे अपील करने लगती है कि भगवान के लिए जल्दी शादी कर, अपनी बेटियों की जिंदगी बरबाद न करो।

अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी ननकना यादव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | अपनी पढ़ाई रोक कर पांच बहनों को पढ़ा रही कुसुम
स्मार्ट बेटियां | अपनी पढ़ाई रोक कर पांच बहनों को पढ़ा रही कुसुम

कुसुम अभी दसवीं में पढ़ ही रही थी कि उसके किसान पिता की तबीयत ऐसी खराब हुई कि उन्होंने खाट ही पकड़ ली। कुसुम ने किसी तरह दसवीं तो पास कर ली लेकिन आगे की पढ़ाई जारी रखने के हालात नहीं बने। इलाज के लिए खेत तक बिक गये थे। इन मुश्किलों से हारे बिना कुसुम ने एक सिलाई मशीन खरीदी और उससे होने वाली आमदनी से अपनी पांच बहनों की पढ़ाई को जारी रखा।

बलरामपुर के देवपुरा गांव की कुसुम गिरि की दिक्कतें पिता की बीमारी के साथ बढ़ने लगी थीं। मजबूत इरादों की कुसुम को जब दसवीं के बाद अपनी पढ़ाई जारी रखने की सूरत न दिखी तो उसने आमदनी का जिम्मा अपने ऊपर लेते हुए छोटी बहनों को आगे बढ़ाने का काम किया। सिलाई मशीन ने राह खोली तो छोटी बहनों का एडमिशन राधा आदर्श बालिका इंटर कॉलेज में कराया। वहां के शिक्षकों को जब पता चला कि बड़ी बहन कितनी जद्दोजहद करके छोटी बहनों को यहां पढ़ा रही है तो उन्होंने फीस माफ करके मदद की।

कुसुम बिना हिचक कहती है कि वह छोटी बहनों के पढ़ाई के सपने पूरे होने तक इसी तरह उनके पीछे खड़ी रहेगी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी निशू पांडेय ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | 16 की उम्र में ब्याही बहू अब जगाती है पूरा गांव
स्मार्ट बेटियां | 16 की उम्र में ब्याही बहू अब जगाती है पूरा गांव

तुलसीपुर गांव की ममता मिश्रा भुक्तभोगी हैं। खुद उनकी शादी सोलह बरस की कच्ची उम्र में ‌हो गई ‌थी। उसका असर उन्होंने अपनी सेहत, अपने आत्मसम्मान और अपने वज़ूद पर सीधे पड़ते देखा। ममता देर से जागीं। लेकिन जब जागीं तो ऐसी जागीं कि पूरे गांव को जगाने का संकल्प ले लिया।

यूपी के पिछड़े बलरामपुर जिले के इस गांव में ममता मिश्रा एक आशा बहू की हैसियत से काम करती हैं। कुछ समय पहले उन्होंने आशा बहू की ट्रेनिंग ली थी। अब वे गर्भवती महिलाओं को अपनी देखभाल और खुराक के बारे में नसीहत देती हैं। लेकिन अपनी ड़्यूटी निभाते वक्त ममता सबको यह याद दिलाना नहीं भूलती कि परिवार में किसी बेटी को बाल विवाह की चक्‍की में नहीं झोंकना।

ममता बताती हैं कि उनके छोटे-छोटे प्रयासों का अब असर हो रहा है। गांव वाले सचमुच जाग रहे हैं। धीरे-धीरे वे बेटियों की हायर एजुकेशन को कबूल कर रहे हैं। ममता का मकसद भी यही है - बेटियों को ग्रेजुएट बनाने की मुहिम चलाना। ग्रेजुएशन यानी बीए तक पढ़ाई का मतलब होगा कि कम से कम अठारह साल तक बच्ची का विवाह के झंझट से दूर रहना।

अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी प्रियंका उपाध्याय ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | सहेलियों की दुर्दशा देखी थी सुमन ने पढ़ाई न रुकने दी
स्मार्ट बेटियां | सहेलियों की दुर्दशा देखी थी सुमन ने पढ़ाई न रुकने दी

गांव के सब लोग कह रहे थे कि जल्दी से सुमन की शादी कर दो। मां-पिता इसके लिए तैयार हो गये थे लेकिन सुमन अड़ गयी कि पढ़-लिख कर कुछ बन जाऊंगी, तभी शादी करूंगी। सुमन ने देखा था कि उसकी जिन सहेलियों की शादी कम उम्र में हुई, उन सबकी पढ़ाई छूट गयी। सुमन ने तय कर रखा है कि शिक्षिका बनने के बाद ही इस बारे में सोचेगी।

सुमन जानती है कि कम उम्र में शादी करने से लड़कियों का भविष्य बर्बाद हो जाता है। पढ़ाई छूटती है, स्वास्थ्य नष्ट होता है और आने वाली संतान भी कमजोर होती है। सब उसका देखा-समझा है। इसीलिए श्रावस्ती के धुम्बोझी गांव की इस समझदार बेटी ने अपने हालात को सही तरह से परख कर पढ़ाई जारी रखने का रास्ता चुना है। उसके एक-एक भाई बहन की शादी हो चुकी है और छोटे दो भाई पढ़ रहे हैं। मजदूरी करके पिता परिवार को पाल रहे हैं और इस कड़े संघर्ष से परिवार को उबारने में सुमन अपना भी योगदान करने को संकल्पित है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी पिंकी देवी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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बेटे की मौत से टूटे नहीं, पोतियों को बीए कराया | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
बेटे की मौत से टूटे नहीं, पोतियों को बीए कराया | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

भले ही यूपी का श्रावस्ती जिला बाल विवाह की सबसे ऊंची दर के ‌लिए देश भर में कुख्यात हो, लेकिन उसी जिले के सोनरई गांव में एक वयोवृद्ध हैं जिनकी तपस्या के आगे सिर झुकाने को मन करता है। नब्बे साल के किसान लल्लू सिंह वास्तव में एक मिसाल हैं। उन्होंने जवान बेटे को अपने सामने दम तोड़ते देखा। लेकिन बिना हिम्‍मत हारे, बेटे के चार बच्चों और अपनी विधवा बहू के पालन-पोषण का जिम्मा उठाया और एक दिन अपने चारों पोते-पोतियों को ग्रेजुएशन करा कर दम लिया।

आज लल्लू सिंह के दोनों बड़े पोते ग्रेजुएट हैं। एक पोता प्राइवेट नौकरी करता है। दोनों पोतियों को भी ग्रेजुएट बनाकर ही ससुराल रवाना किया। अपनी पत्नी और विधवा बहू का भी पूरा ख्याल रखा। अब इस उम्र में भी खेती-बाड़ी करते हैं और मेहनत में जवानों को मात देते हैं।

दोष श्रावस्ती जिले का नहीं है। वहां के औसत परिवारों की गलत सोच का है। लल्लू सिंह साबित कर रहे हैं कि श्रावस्ती में भी समझदार परिवार-मुखियाओं की कमी नहीं।

अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी अंबालिका सिंह ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | अपने दुख नहीं भूलते, बेटी की कम उम्र में शादी असंभवः गीता
स्मार्ट बेटियां | अपने दुख नहीं भूलते, बेटी की कम उम्र में शादी असंभवः गीता

अपने जीवन के दुखों से पक्की सीख लेकर गीता देवी ने तय कर रखा है कि तीनों बेटियों की शादी किसी भी कीमत में कच्ची उम्र में नहीं करेंगी। बड़ी बेटी कोमल को तब तक पढ़ाने का हौसला है गीता देवी का जबतक वह अफसर न बन जाए।

गीता देवी की कम उम्र में शादी हो गयी थी, पढ़ाई भी रुक गयी। ससुराल में कोई पढ़ा-लिखा न था। पूरा जीवन ही कठिनाई में बीता। मेहनत-मजूरी और सिलाई करके 15 साल की कोमल को पढ़ा रही हैं गीता और इसी दम पर उसकी पढ़ाई जारी रखने की जिद है। बावजूद इसके कि करीबी रिश्तेदारों ने कोमल की शादी कर देने का राग कई बार अलापा है। उन सबको बहुत साफ शब्दों में गीता देवी ने बता दिया है कि जबतक कोमल अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, तबतक उसकी शादी नहीं करने दूंगी। पराये धन पर क्यों अपना पैसा बर्बाद कर रही हो—  पड़ोसियों के इस उलाहने की भी कोई परवाह नहीं करतीं श्रावस्ती के घोरमा परसिया गांव की गीता देवी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी प्रीति राव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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हमारे गांव में हर 10वें बच्चे का बाल विवाह होता है | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
हमारे गांव में हर 10वें बच्चे का बाल विवाह होता है | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

राधेश्याम एक टीचर हैं और गांव के हालात को देखकर दुखी हैं। जब वे कक्षा में बच्चों को पढ़ाते हैं तो उन्हें पता होता है कि सामने बैठे हर दसवें बच्चे का कच्ची उम्र में ब्याह कर दिया जाएगा। लेकिन अपना दुख लेकर राधेश्याम बैठे नहीं रहते। उन्होंने गांव से बालविवाह को पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया है और इसके लिए वे नियमित तौर पर परिवारों की काउंसिलिंग करते हैं।

राधेश्याम बाल विवाह की बहुत ऊंची दर के लिए चर्चित बलरामपुर जिले के गैसड़ी ब्लॉक के मुतेहरा गांव में रहते हैं। उनके तीन बच्चे हैं। बड़े दोनों बेटे अपने व्यापार में हैं। छोटी बेटी इंटर में पढ़ रही है। वे बताते हैं कि बाल विवाह का सबसे बड़ा कारण गरीबी है। मां-बाप को लगता है कि बड़ी उम्र होने पर रिश्ता मुश्किल से मिलेगा और शादी में ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। कई परिवार इसलिए बच्ची को जल्द विदा कर देते हैं कि घर के एक सदस्य का खर्चा कम होगा।

इन गलतफहमियों को देर करने का एक ही रास्ता है -- सलाह-मशविरा। धैर्य के साथ माता-पिता का ह्रदय परिवर्तन। वही राधेश्याम कर रहे हैं। यह संकल्प तो उनका है ही कि बेटी की शादी अठारह साल के बाद ही करेंगे।

अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी सती अनुसूइया ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | आशा ट्रेनिंग ने आंखें खोलीं अब रोकती हैं बाल विवाह
स्मार्ट बेटियां | आशा ट्रेनिंग ने आंखें खोलीं अब रोकती हैं बाल विवाह

अंजलि राव ने अगर तीन साल पहले आशा बहू की ट्रेनिंग न ली होती तो आज वह एक साधारण गृहिणी होतीं। लेकिन आज वे न सिर्फ अपना घर अच्छे से संभालती हैं, बल्कि आसपास के गांवों में भी परिवारों को बाल विवाह करने से रोकती हैं।

श्रावस्ती के जमुनहा ब्लॉक में सेहरिया गांव की निवासी अंजलि के पति विजय कुमार क्षेत्र के ग्राहक सेवा केंद्र में काम करते हैं। उनकी एक बेटी है अंशिका जो दूसरी कक्षा में पढ़ रही है। बेटा रवि पहली कक्षा का छात्र है। अंजलि बताती हैं‌ कि जिले के हालात बहुत खराब हैं। यहां आए दिन किसी बाल विवाह की खबर आती है। कच्ची उम्र में बच्चों या बच्चियों का ब्याह कर दिया जाता है। कई छोटी लड़कियों की सेहत और पढ़ाई लिखाई पर बाल विवाह का ग्रहण लग चुका है। परिवार वाले पता नहीं क्यों, उनका दर्द देख नहीं पाते। तरह-तरह की पुरानी मान्यताओं और गरीबी के चलते वे बेटियों को जल्द घर से विदा करने पर आमादा रहते हैं।

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अंजलि बताती हैं कि जब वे परिवारों में आशा बहू के रूप में जाती हैं तो उन्हें समझाती हैं। बाल विवाह के नुकसान कायदे से समझाती हैं। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में स्थिति सुधरेगी।

अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी अंजलि ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | 15 साल की शालू बोली, खिलवाड़ नहीं सहूंगी | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
स्मार्ट बेटियां | 15 साल की शालू बोली, खिलवाड़ नहीं सहूंगी | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

डॉक्टर बनना मेरा सपना है, उसके बाद ही मैं शादी करना चाहती हूँ—  शालू को अपने इस सपने को पूरा करने की छूट मिली है। इंटरमीडिएट में पढ़ रही 15 साल की शालू अपने माता-पिता से बहुत खुश है क्योंकि उन्होंने अपना मन बदलकर छोटी उम्र में बेटी की शादी न करने की बात मान ली और उसे आगे पढ़ने की छूट दी। डॉक्टर बनने का सपना मन में संजोए शालू मेहनत से पढ़ रही है।

श्रावस्ती के धुम्बोझी गांव की शालू के 14 साल की होते ही उसकी शादी की बात पिता ने चला दी थी। घर बैठकर सिलाई करके अपने किसान पति को आर्थिक सहयोग करने वाली शालू की मां ने उसके पिता को बेटी के आगे पढ़ने के सपने के बारे में न केवल बताया बल्कि इस बात के तैयार भी किया कि शालू को आगे पढ़ने दिया जाए। शालू के साथ ही उसके छोटे भाई और छोटी बहन की पढ़ाई के लिए भी मां की सिलाई की कमाई ही काम आती है। सब मिलकर साझे सपनों को पूरा करने के लिए साझी ताकत के बल पर आगे बढ़ रहे हैं।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी पिंकी देवी ने संजना से विस्तार से बात करके यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | 16 में बची, अब उच्च शिक्षा और हुनर से लैस कर रही खुद को
स्मार्ट बेटियां | 16 में बची, अब उच्च शिक्षा और हुनर से लैस कर रही खुद को

गांव के चलन के लिहाज से सावित्री की शादी भी कच्ची उम्र में ही हो जाती और आज बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही सावित्री 16 साल की उम्र में ही अपनी जिंदगी में अंधियारा भर दूसरे घर की ‘रौनक’ बनने को विदा हो जाती। लेकिन मां से बार बार की गयी जिद ने उसका साथ दिया, घर वालों को उसकी बात में दम नजर आया और उसकी शादी की बातें रोक दी गयीं।

घर से ही प्राइवेट बीए की पढ़ाई की तैयारी करने के साथ सावित्री बुनाई-कढ़ाई का काम भी करती है और अपने को हर तरह से हुनरमंद बनाते हुए आत्मविश्वास के साथ उच्च शिक्षा हासिल कर जीवन में कुछ बेहतर कर दिखाने के इरादे से बढ़ रही है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी मीरा देवी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

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स्मार्ट बेटियां | संकोच छोड़ जिद ठानी, वरना 15 में ही ब्याह दी जाती सन्नू
स्मार्ट बेटियां | संकोच छोड़ जिद ठानी, वरना 15 में ही ब्याह दी जाती सन्नू

चार बहनों और एक भाई वाले परिवार की बेटी सन्नू अपने संकोची स्वभाव के बावजूद मां से इस बात की जिद ठान सकी कि उसकी पढ़ाई रोककर 15 साल की ही उम्र में उसकी शादी न कर दी जाए। मां के लिए यह निर्णय आसान नहीं था लेकिन बेटी की मनुहार के आगे वह पिघल गयीं और परिवार में इस बात पर रजामंदी बन ही गयी कि फिलहाल सन्नू को पढ़ाई करने दिया जाए।

श्रावस्ती के गजोबरी गांव की सन्नू के पिता शिक्षामित्र के रूप में काम करते हैं और पांच बच्चों के भरण-पोषण के लिए कठिन जद्दोजहद करनी पड़ती है उनको। चाहते तो यही थे कि सन्नू की शादी के ‘बोझ से छुट्टी पाते’ तो कुछ राहत मिलती। लेकिन बेटी की बातों ने उनके भी दिमाग को पलट दिया और बाल विवाह के खतरों को समझ अपना मन बदल दिया पिता रामफेरन ने। आज 17 साल की सन्नू 12वीं में पढ़ रही है और उसे भरोसा है कि पढ़ाई पूरी करके वह जिंदगी में कुछ बेहतर करके दिखाएगी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी विनीता मौर्य ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

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स्मार्ट बेटियां | मंजू ने बच्चों को बाल विवाह के दंश से आजाद रखा
स्मार्ट बेटियां | मंजू ने बच्चों को बाल विवाह के दंश से आजाद रखा

घर की तमाम मजबूरियों के नाम पर मां ने मंजू देवी की शादी उनके बचपन में ही कर दी थी। अपने बाल विवाह से जूझकर आगे बढ़ी मंजू देवी ने अपने बच्चों को ऐसी दिक्कतों से बचा कर रखने का प्रण किया और उसे निभाया भी।

बलरामपुर के रानीजोत गांव की मंजू देवी के पिता के न रहने के बाद उनकी मां ने पारिवारिक मजबूरियों का हवाला देकर मंजू की शादी बचपन में ही कर दी थी। तमाम दिक्कतों को झेलते हुए आगे बढ़ी जिंदगी मंजू देवी की। कम उम्र में बच्चे होने की अनेक समस्याओं से जूझना पड़ा मंजू उनको। शारीरिक बीमारियों और मानसिक उलझनों के दौर आते रहे।

इन दिक्कतों ने मंजू के मन में यह संकल्प एकदम पक्का कर दिया कि उनके बच्चों की शादी बचपन में नहीं होगी। बेटे और बेटी में कोई भी भेद किये बिना उन्होंने दोनों को एकसमान तरीके से पाला-पोसा और उनकी पढ़ाई की व्यवस्था भी की। बच्चों की खुशी और खुशहाली को ही उन्होंने अपनी खुशी माना और जिया।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी श्वेता तिवारी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

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स्मार्ट बेटियां | बढ़ने के लिए कोचिंग पढ़ाई, ननिहाल रही पुलिस सेवा में जाने की जिद है मीरा की
स्मार्ट बेटियां | बढ़ने के लिए कोचिंग पढ़ाई, ननिहाल रही पुलिस सेवा में जाने की जिद है मीरा की

अनपढ़ चंपा देवी की समझदारी और हिम्मत बहुतेरे पढ़े-लिखों से बेहतर है। बेहद कठिन हालात के बावजूद वह अपनी बेटी का विवाह 18 साल की उम्र होने के बाद ही करने की जिद ठाने हैं। बाल विवाह न करने के पीछे के तर्क चंपा देवी की प्रगतिशील सोच को बयां करते हैं। अपनी बच्ची का वर्तमान और भविष्य चौपट होने से बचाना है तो उसे 18 साल से पहले ब्याहने की सोचो भी मत—  दो टूक शब्दों में कहती हैं जमुनहा ब्लॉक के भरथा गांव की चंपा देवी। 

श्रावस्ती के तमाम गांवों से अलग भरथा की समस्याएं कुछ ज्यादा ही रही हैं। चंपा देवी और पति धनीराम यादव का घर और खेत बाढ़ में कट गये थे। मजदूरी करके किसी तरह से दो बेटियों और तीन बेटों को पाला-पोसा है इस दंपति ने। उनकी 14 साल की बड़ी बेटी के लिए ही गांव वालों ने विवाह का दबाव बनाना चाहा तो चंपा देवी ने साफ मना कर दिया। सब तरह के कष्ट सहकर भी वे अडिग हैं कि बेटी को समय से किसी भी सूरत में नहीं ब्याहेंगी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी मीरा देवी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | एम ए में पढ़ती बेटी को देखकर मिलता सुकून
स्मार्ट बेटियां | एम ए में पढ़ती बेटी को देखकर मिलता सुकून

भुच्च देहात में रहने वाला एक साधारण किसान ही जानता है कि बेटी को उच्च शिक्षा हासिल करते देख कितनी शांति मिलती है। श्रावस्ती के किसान रामनरेश यादव कहने को साधारण हैं लेकिन उनकी सोच खासी असाधारण है। उन्होंने बेटे-बेटी का भेद किए बिना अपनी संतति को ऊंची तालीम देने का संकल्प लिया हुआ है। बेटा बीएससी कर रहा है। बड़ी बेटी एम ए कर रही है और छोटी बेटी ग्यारहवीं क्लास में पढ़ रही है। जिस गांव में ज्यादातर बच्चियों की शादी पंद्रह-सोलह साल की कच्ची उम्र में ही कर दी जाती हो, वहां रामनरेश यादव एक मिसाल बनकर सामने आए हैं।

श्रावस्ती जिले के इकौना ब्लॉक के बनकटा गांव में रहने वाले रामनरेश की सोच बिल्कुल साफ है। वे कहते हैं कि बाल विवाह का मतलब है बेटी के लिए बीमारियों को न्यौता और अधूरी तालीम। दोनों ही चीजें मुकम्मल इंसान बनने के रास्ते की अड़चनें हैं। इसलिए उन्होंने सोचा कि बेटियों को कच्ची उम्र में नहीं ससुराल नहीं भेजना, चाहे जो हो जाए। रामनरेश की सोच रंग ला रही है। उनकी बच्चियां जवान होने के सा‌थ साथ बाकायदा शिक्षित भी हो रही हैं। वे अपना भविष्य बनाने के रास्ते पर हैं।

अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी राजकुमारी यादव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

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बेटी को बेटे से ज्यादा शिक्षा दिलाने का प्रण | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
बेटी को बेटे से ज्यादा शिक्षा दिलाने का प्रण | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

वह एक सामान्य किसान हैं। दौलत-विरासत है नहीं, बस किसी तरह गुजर हो जाती है। घर में दो बे‌टियों के अलावा एक बेटा है। बेटी सोलह साल की है और पढ़ रही है। पड़ोसियों और रिश्तेदारों का दबाव है कि बेटी जवान हो रही है, उसकी शादी कर देनी चाहिए। दोस्त भी यही कहते हैं। ऐसे में राजेंद्र क्या करे?

जवाब खुद राजेंद्र प्रसाद यादव देते हैं। श्रावस्ती जिले के जमुनहा ब्लॉक के गांव अलागांव में रहने वाले राजेंद्र कहते हैं कि चाहे जो हो जाए, लेकिन बच्ची को स्कूल से उठाकर शादी की भट्टी में नहीं झोंकना। वह कहते हैं कि कच्ची उम्र के ब्याह के जोखिम उन्होंने देखे हैं। कई लड़कियों का जीवन बर्बाद होते देखा है।

राजेंद्र कहते हैं कि जितना बेटी के ब्याह का दबाव बढ़ता जाता है, उतना ही उनका संकल्प पक्का होता जाता है। संकल्प यह है कि बेटी को बेटे से भी ज्यादा एजुकेशन दिलवानी है। इसलिए वह अडिग हैं। बेटी गांव के ही आदर्श ग्रामीण सेमई प्रसाद स्कूल, मनवरिया दीवान, में पढ़ रही है। अड़ोसी-पड़ोसी अपनी बेटियों का बाल विवाह आए दिन कर रहे हैं। लेकिन राजेंद्र को कुछ फर्क नहीं पड़ता। उनके संकल्प के दिये की लौ निष्कंप जल रही है।

अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी सुशीला देवी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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बेटी, ऐसा लड़का बड़ी मुश्किल से मिलता है। तेरी किस्मत है कि उनको तू पसंद आ गई है। पढ़ाई-लिखाई तो बाद में भी होती रहेगी..
बेटी, ऐसा लड़का बड़ी मुश्किल से मिलता है। तेरी किस्मत है कि उनको तू पसंद आ गई है। पढ़ाई-लिखाई तो बाद में भी होती रहेगी..

अपनी मां के ये शब्द पुष्पा के कानों में अब भी गूंजते हैं। उसे याद है कुछ माह पहले जब वह स्कूल से घर लौटी थी तो घर में उसकी शादी की बात चल रही थी। हैरान-परेशान पुष्पा ने सबसे पूछा तो कोई सही से जवाब नहीं देता था। फिर मां ने कोने में ले जाकर उससे कहा था कि बेटी हर लड़की को एक न एक दिन तो ससुराल जाना ही पड़ता है।

यूपी का बलरामपुर जिला कच्ची उम्र में बेटियों का ब्याह कर दिए जाने के लिए बदनाम है। स्कूल छुड़ा कर शादी कर देना यहां कोई अनहोनी बात नहीं है। हर दूसरे घर में ऐसा होता है। इसलिए चरन गहिया गांव की पुष्पा की जिंदगी में जब यह मोड़ आया तो उसे छोड़ सबके लिए यह एक रोजमर्रा की घटना थी। लेकिन कस्तूरबा आर्या बालिका इंटर कॉलेज, तुलसीपुर, में बारहवीं में पढ़ रही पुष्पा ने फैसला कर लिया कि जो होता आया है, वह अब नहीं होगा।

पुष्पा ने मां का दिल पलटने के लिए तरीके से बैठकर बात करने की रणनीति अपनाई। मां के साथ बैठकर उसे समझाया कि क्यों उसका पढ़ते रहना जरूरी है। क्यों शादी उसकी जिंदगी में फुलस्टॉप साबित होगी और इसमें उसकी सेहत के लिए क्या क्या खतरे हैं। थोड़ा वक्त लगा लेकिन बाद में मां समझ गई। पुष्पा ने उनका फैसला पलट दिया। लड़केवालों को रिश्ता लौटा दिया गया।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी प्रियंका यादव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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खुद नहीं पढ़े लेकिन चारों बेटियों को पढ़ाने का प्रण | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
खुद नहीं पढ़े लेकिन चारों बेटियों को पढ़ाने का प्रण | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

पढ़ने-लिखने से हमेशा दूर रहे राधेश्याम जानते हैं कि जीवन में शिक्षा का क्या मोल है। इसलिए गरीबी की तमाम चुनौतियों को झेलने के बावजूद उनका संकल्प है कि वे अपनी चारों बेटियों में से किसी का ब्याह जल्दी नहीं करेंगे और सबको अच्छी शिक्षा दिलाकर ही उनके हाथ पीले करेंगे। जिला श्रावस्ती के ब्लॉक गिलौली में एक गांव है जिसका नाम है कोकलवारा। यह जिला बहुत अधिक बाल विवाह होने के कारण देश भर में बदनाम है।

गरीबी और लड़की को बोझ समझने की धारणाओं का मेल ऐसा बैठता है कि ज्यादातर ग्रामीण परिवारों को लड़कियों को ऊंची तालीम दिलाने का विचार बहुत बड़ी विलासिता लगता है। इसलिए आसार यही थे कि कोकलवारा के किसान राधेश्याम अपनी चारों बेटियों को पढ़ाने का धैर्य नहीं रखेंगे। लेकिन राधेश्याम ने सबको गलत साबित कर दिया।

उनकी चारों बे‌टियां स्कूल जाती हैं और सबसे बड़ी- विद्यावती- के अठारह बरस की होने के बावजूद निकट भविष्य में उसकी पढ़ाई बंद कर शादी कर देने का उनका कोई इरादा नहीं है। वह परमहंस मंगलदास स्कूल में साइंस की पढ़ाई कर रही है। उससे छोटी बे‌टी किरन भी उसी स्कूल में दसवीं में पढ़ रही है। सबसे छोटी दो बेटियां भी कोकलवारा के प्राथमिक स्कूल में पढ़ती है।

राधेश्याम की वार्षिक आमदनी हजारों में है। घर बड़ी मुश्किल से चलता है। लेकिन वे मानते हैं कि चाहे दो रोटी कम खानी पड़े, बच्चियों की एजुकेशन पर कोई समझौता नहीं। उनकी पढ़ाई जरूर पूरी होगी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी नीतू यादव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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बड़े बदलाव की छोटी कहानियां | चार बेटियों के बाप ने लिया पवित्र संकल्प
बड़े बदलाव की छोटी कहानियां | चार बेटियों के बाप ने लिया पवित्र संकल्प

राकेश मिश्रा किसान हैं और चार बेटियों व दो बेटों के पिता हैं। उनकी उपलब्धि यह है कि उन्होंने बेटियों को बेटों से बराबर तालीम दी है। वह कहते हैँ कि खुद उनकी शादी छोटी उम्र में हुई थी। वह गलती अब उनके बच्चे नहीं दोहराएंगे। बलरामपुर के ग्राम मचड़ी के निवासी राकेश मिश्रा बताते हैं कि उनके दोनों बेटे घर से दूर हैं। एक कंपनी सेक्रेटरी की पोस्ट पर है। दूसरा बलरामपुर में बीएससी कर रहा है। एक बेटी कानपुर में रहकर नेट की तैयारी कर रही है और दूसरी एक एनजीओ में काम करती है। दोनों छोटी बहनें भी स्कूल में पढ़ रही हैं।

राकेश का जीवन सूत्र बड़ा सादा है। बेटों की शादी इक्‍कीस बरस से पहले नहीं और बेटियों की अठारह से पहले नहीं। यही संकल्प उन्होंने बरसों पहले लिया था। उस पर उनका अमल जारी है। राकेश खुद बारहवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाए लेकिन बच्चों को वह उच्च शिक्षा दिलाएंगे, इसमें किसी को शक नहीं है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी प्रियंका मिश्रा ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | अपनी गलती बेटियों को नहीं दोहराने देगी सरस्वती
स्मार्ट बेटियां | अपनी गलती बेटियों को नहीं दोहराने देगी सरस्वती

सरस्वती देवी की कहानी एक आम ग्रामीण भारतीय परिवार की कहानी जैसी ही है। कम उम्र में शादी। एक के बाद एक बच्चे पैदा होना। किसी विपदा के बाद घर में कमाई बंद हो जाना और फिर जिंदगी का घिसट घिसट कर बढ़ना। सरस्वती देवी बलरामपुर जिले की पचपेडवा पोस्ट के गांव आजमडीह में रहती हैं। उनके परिवार में चार बेटे और दो बेटियां हैं। वे कहती हैं कि कम उम्र में ब्याह के कारण उन्हें जीवन में ब‌हुत तकलीफें झेलनी पड़ीं।

एक समय ऐसा भी आया जब घर में कोई भी कमाने वाला नहीं बचा। कई बार नौकरी या काम धंधे की सोची लेकिन पढ़ाई कम होने के कारण साहस नहीं जुटा सकीं। अब वे अपने सब बच्चों को स्कूल में पढ़ा रही हैं। वे कहती हैं जो मेरे साथ हुआ, वह मेरी बेटियों के साथ नहीं होगा। स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी नीतू पांडे ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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बड़े परिवार से भी जीती अकेली शिवानी की जिद, जारी है पढ़ाई | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
बड़े परिवार से भी जीती अकेली शिवानी की जिद, जारी है पढ़ाई | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

दादा-दादी, मां-पिता और दो भाइयों वाले परिवार की सदस्या शिवानी अभी 13-14 साल की ही थी कि घर में उसकी शादी की चर्चा गरमाने लगी। यही चलन था उसके गांव का। लेकिन शिवानी के सपने अलग थे और अलग ही थी उसकी जिद। शुरू में बड़े-बुजुर्गों ने उसकी कुछ न सुनी लेकिन शिवानी भी अड़ गयी कि अभी मुझे और पढ़ाई करनी है, शादी अभी नहीं। आखिरकार मां के समझ जाने के बाद धीरे-धीरे सभी लोग राजी हो गये और आज 11वीं में पढ़ रही 18 साल की शिवानी पुलिस सेवा में जाने का सपना संजोए आगे बढ़ रही है।

शिवानी बताती है कि उसके स्कूल में भी इस बात को बार बार बताया गया था कि कच्ची उम्र में शादी हो जाए तो लड़की की सेहत और मानसिकता, दोनों ही कमजोर रह जाते हैं और जीवन भर तकलीफें झेलनी पड़ती हैं। यह समझाइश शिवानी के दिलो-दिमाग में गहरे उतर गयी और उसने ठान लिया था कि बिना कुछ हासिल किये वह शादी के लिए हर्गिज तैयार न होगी। श्रावस्ती के गिलौला ब्लॉक के रानीपुर काजी गांव के इस बड़े परिवार में भी शिवानी की छोटी जिद ने अपने लिए जगह बना ही ली।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी वंदना सिंह ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

शिवानी बताती है कि उसके स्कूल में भी इस बात को बार बार बताया गया था कि कच्ची उम्र में शादी हो जाए तो लड़की की सेहत और मानसिकता, दोनों ही कमजोर रह जाते हैं और जीवन भर तकलीफें झेलनी पड़ती हैं। यह समझाइश शिवानी के दिलो-दिमाग में गहरे उतर गयी और उसने ठान लिया था कि बिना कुछ हासिल किये वह शादी के लिए हर्गिज तैयार न होगी। श्रावस्ती के गिलौला ब्लॉक के रानीपुर काजी गांव के इस बड़े परिवार में भी शिवानी की छोटी जिद ने अपने लिए जगह बना ही ली।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी वंदना सिंह ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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अपने वजूद की तलाश थी, बाल विवाह रुकवा लिया विनीता ने | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
अपने वजूद की तलाश थी, बाल विवाह रुकवा लिया विनीता ने | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

बीएससी द्वितीय वर्ष में पढ़ रही विनीता यादव के पिता ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही विनीता का रिश्ता करीब-करीब तय कर दिया था। लड़का पढ़ा-लिखा भले ही कम था लेकिन अमीर परिवार से था। यह गुण उनके लिए काफी था। विनीता को जब पता चला तो उसने सीधे मां से कहा कि वह अपने वजूद की तलाश में और पढ़ना चाहती है। कुछ बनकर ही शादी की बात सोचेगी। अंततः पिता भी मान गये और आज विनीता बीएससी तृतीय वर्ष में पढ़ रहे भाई की तरह ही बीएससी कर रही है।

किसान पिता और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मां की बेटी विनीता अपने रास्ते के बारे में स्पष्ट है। इतनी ही साफगोई से उसने अपनी पढ़ाई जारी रखने की बात मां के जरिए पिता तक पहुंचवाई थी। उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के जमनुहा ब्लॉक के त्रिलोकपुर गांव के निवासी विनीता के पिता को तो लगा था कि लड़का पढ़ाई में थोड़ा कमजोर भी हुआ तो क्या, पैसे तो मजबूत है, बेटी आराम से रहेगी। लेकिन विनीता को तो खुद के पैरों पर खड़े होने की जिद थी और इसी जिद को उसने मां के जरिए पिता तक पहुंचाया। बेटी के स्पष्ट विचारों से पिता को भी अहसास हुआ कि उन्हें शादी कि जिद कच्ची उम्र में नहीं करनी चाहिए।

आज दोनों  भाई-बहन विज्ञान के ग्रेजुएट होने की राह पर हैं, खुश हैं और अपने भविष्य की इबारत अपने हाथों लिखने के हुनर को तराश रहे हैं।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी अंजुम बानो ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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सागौन के पत्तों पर खाना खाया पर शिक्षा में कमी न होने दी | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
सागौन के पत्तों पर खाना खाया पर शिक्षा में कमी न होने दी | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

बेटे-बेटियां शिक्षित होंगे तो अपने साथ-साथ समाज के भी काम आयेंगे। और लड़कियां तो दो घरों को रौशन करती हैं, इसलिए उनका शिक्षित होना तो बहुत ही जरूरी है। तमाम मुश्किलों के बावजूद इन विचारों को अपने जीवन में उतारने वाले जगदीश प्रसाद ने तीन बेटियों को बीए तक की शिक्षा दिलवाई, तीनों ने आंगनबाड़ी में काम भी किया। चौथी बेटी अभी इंटर में पढ़ रही है और उसे भी अपने पैरों पर खड़ा होने लायक शिक्षित करने का इरादा है उनका। दो बेटों की शिक्षा के लिए भी उतने ही सजग हैं जगदीश क्योंकि बेटे-बेटियों में कोई भेद नहीं करते वह।

संघर्ष और संकल्प की यह कहानी है परिवार बलरामपुर के अहिरौली गांव जगदीश प्रसाद की। सागौन के पत्तों पर खाना और छोटी सी झोंपड़ी में रहने वाले जगदीश प्रसाद के बच्चों ने भी अच्छी शिक्षा पाने के लिए मिली पिता की सरपरस्ती में अच्छे परिणाम देने वाला संघर्ष किया और आगे बढ़े।

जगदीश कहते हैं कि बेटे तो अपने पास रहते हैं लेकिन बेटियां तो शादी होकर दूसरे घर जाती हैं। इसलिए इन्हें तो इतना गुणी और समर्थ होना चाहिए कि जहां रहें, सबकी दुलारी-प्यारी बनी रहें।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी रंजना देवी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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‘चाची’ की मदद से जल रहा रोशनी के जीवन में आस का दीया | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
‘चाची’ की मदद से जल रहा रोशनी के जीवन में आस का दीया | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

पड़ोसी चाची ने आकर घरवालों को ठीक से न समझाया होता तो 15 साल की रोशनी के  जीवन से डॉक्टर बनने की आस की रोशनी तो बुझ ही गयी थी। आठवीं में पढ़ रही रोशनी को बाल विवाह की गिरफ्त से बचने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी।

अपनी बात का कोई असर न होता देख कर श्रावस्ती के इकौना ब्लॉक के बगनहा गांव की 8वीं की इस छात्रा ने पड़ोसियों का सहारा लिया। पड़ोसी चाचा-चाची को बाल विवाह के खिलाफ तर्कों से जीतना रोशनी के लिए आसान साबित हुआ। एक बार वे तैयार हो गये तो फिर चाची की अगुवाई में दोनों  ने आकर रोशनी के माता-पिता को कायदे से समझाया कि लड़की की जिंदगी से खिलवाड़ मत करो, उसे अभी पढ़ने दो। बाल विवाह से जुड़ी तमाम परेशानियों को जब चाची ने रोशनी के माता-पिता को बताया तो बातें उनके भी दिमाग में घर कर गयीं।

छोटी सी रोशनी की घुमाकर कान पकड़ने की यह रणनीति काम कर गयी और उसकी शादी की चर्चा भी रुक गयी। अब वह सुकून के साथ पढ़ती हुई आगे बढ़ रही है, खुलकर अच्छी शिक्षा पाने के सपने देख रही है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी ननकना यादव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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मौसी ने मां को समझाया तो बच गयी सोनी | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
मौसी ने मां को समझाया तो बच गयी सोनी | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

भतीजी सोनी का बाल विवाह रुकवाने के लिए मौसी रेशमा शुक्ला की समझाइश ही काम आई। सोनी को जब लगा कि उसके कहने से माता-पिता शायद नहीं मानेंगे तो उसने मौसी की मदद लेना ही मुनासिब समझा। मां-मौसी के रिश्तों की गरमाहट का उसे अंदाज था। यहीं उसकी आस टिक गयी।

इकौना ब्लॉक के बिशुनापुर गांव की रेशमा से जब भतीजी ने तकलीफ बताई और पढ़ाई पूरी करके ही विवाह करने की इच्छा कारण सहित बताई, तो रेशमा तुरंत अपनी बड़ी बहन से बात करने के लिए राजी हो गयीं। कम उम्र में बेटी की शादी करने के खतरे कड़ाई से बड़ी बहन को बताये। बेटी और उसकी होने वाली संतान के स्वास्थ्य पर बाल विवाह से होने वाले नुकसान की बात सोनी की मां को समझ आ गयी और तब सोनी इस परेशानी से बच गयी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी रीता तिवारी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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एक जिला जहां लड़कों को भी है बाल विवाह का डर | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
एक जिला जहां लड़कों को भी है बाल विवाह का डर | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

``अभी मैं इंटर में पढ़ रहा हूं और बाल विवाह से बाल-बाल बचा हूं।`` -- यह कहना है अरुण कुमार यादव का जिनकी मूंछें भी अभी ठीक से नहीं आईं हैं। लेकिन बाल विवाह की सबसे ज्यादा दर के लिए बदनाम श्रावस्ती जिले में लड़कियों की तरह लड़कों का भी कच्ची उम्र की शादी में फंस जाना कोई नई बात नहीं है। यहां होने वाली हर पांचवीं शादी वास्तव में बाल विवाह होती है। पास के प्रेम कुमार शुक्ला इंटर कॉलेज में पढ़ रहे अरुण को शायद इस तथ्य का अंदाजा नहीं था। इसलिए उन्हें तगड़ा झटका लगा।

श्रावस्ती के गिलौला ब्लॉक के हरिवंशपुर गांव में रहने वाले अरुण बताते हैं कि कुछ ही दिन पहले उन्हें पता लगा कि उनका परिवार उनकी शादी की तैयारी कर रहा है। हैरान-परेशान अरुण अपनी मां से पूछने गए। मां बोली कि, `` बेटा, मैं अब बीमार रहती हूं। इसलिए चाहती हूं कि तेरी शादी जल्दी हो जाए। `` पिता ने भी कह दिया कि शादी तो करनी ही पड़ती है। अनुनय-विनय का कोई असर उन पर नहीं पड़ा।

अरुण ने ऐसे में अपने कॉलेज टीचर की मदद ली। टीचर घर आए और मां-बाप दोनों को समझाया। अब जाकर उनकी बात समझ में आई। अब अरुण पढ़ रहा है। सही वक्त आने पर वह परिणय सूत्र में बंधेगा। अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी ननकना यादव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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जिससे राखी बंधवाई, उसकी रक्षा भी करके दिखाई | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
जिससे राखी बंधवाई, उसकी रक्षा भी करके दिखाई | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

बलरामपुर के रेहरा बाजार क्षेत्र में एक गांव है रामपुर अर्ना। वहीं एक छोटी दुकान चलाते हैं अमर नाथ वर्मा। घर में छोटी बहन नीलम भी है। कुछ दिन पहले एक मौका ऐसा आया जब अमरनाथ को अपने ही मां-बाप से अपनी बहन की रक्षा करनी पड़ी। दरअसल अमर नाथ के किसान पिता ने नीलम की शादी करने का फैसला कर लिया था। नीलम अभी अठारह बरस की नहीं है। वह स्कूल में पढ़ रही है। लेकिन पिता अड़े थे कि नीलम के हाथ पीले करने हैं। अमरनाथ ने समझाया कि कच्ची उम्र की शादी से नीलम की सेहत और पढ़ाई दोनों चौपट हो जाएंगे। लेकिन वह नहीं माने। बातचीत के कई सत्र हुए। लेकिन पिता जस के तस।

आखिर में अमरनाथ ने पड़ोस में रहने वाले पतिराम को अपनी समस्या बताई। अमरनाथ के पिता पतिराम को बहुत मानते थे। पतिराम ने अमरना‌थ की चिंता को समझा और नीलम का ब्याह टालने के लिए उनके पिता पर दबाव बनाया। जब बेटा और पड़ोसी मिलकर समझाने आए तब पिता को अहसास हुआ कि सचमुच कुछ गलत होने जा रहा था। उन्होंने शादी टाल दी।

नीलम बच गई। अब वह पढ़ रही है। अमरनाथ ने बहन की राखी का फर्ज निभाया। उसकी रक्षा की। बाल विवाह नाम के राक्षस से, जो स्वास्‍थ्य, शिक्षा और आत्मसम्मान सब कुछ खा जाता है। अमर उजाला और यूनीसेफ के ` स्मार्ट बेटियां` अभियान के तहत इंटरनेट साथी अनीता ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | 14 में शादी, 16 में मां बन गई दर्द के दरिया से गुजरी जिंदगी
स्मार्ट बेटियां | 14 में शादी, 16 में मां बन गई दर्द के दरिया से गुजरी जिंदगी

सुनीता की शादी 14 साल की उम्र में हो गयी थी। फिर 16 साल की उम्र में बेटी हो गयी। कच्ची उम्र में ही घर की जिम्मेदारियों, बच्चों का बोझ आ पड़ा जिसके लिए न तो सुनीता का शरीर तैयार था और न ही मन। नतीजा, कई तरह की बीमारियां और दिमागी उलझनें। इन सबसे जूझते हुए फिर अपने को मजबूत करने में जुट गयी सुनीता और बच्चों का जीवन संवारने का साफ रास्ता तय किया उसने।

संघर्षों का लंबा रास्ता तय करके आई सुनीता आज उम्र के 32वें मोड़ पर है। बलरामपुर के ठाकुरपुर गांव की सुनीता ने अपने पैर जमाने के लिए सिलाई सीखी और सिलाई की कमाई से अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा की नींव धरी। आर्थिक धरातल मिला तो जिंदगी में आत्मविश्वास और खुशहाली की कुछ महक आने लगी। किसी भी कीमत पर बाल विवाह नहीं करने और अच्छी शिक्षा की जरूरत के बारे में आज सुनीता खुल कर और अपने निजी अनुभव के आधार पर गांव-समाज को समझाती है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से इंटरनेट साथी के रूप में भी जुड़ी हुई है सुनीता और अपने बारे में यह वीडियो कथा बनाकर खुद उसने ही अमर उजाला को भेजी है। अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | एकजुट परिवार से हार गये गांव-समाज के ताने और दबाव
स्मार्ट बेटियां | एकजुट परिवार से हार गये गांव-समाज के ताने और दबाव

बाल विवाह के खिलाफ परिवार की समझ एक हो जाए तो गांव-समाज के ताने और दबाव आसानी से हार जाते हैं। अनपढ़ उर्मिला देवी की पांच बेटियों को इसी तरह की समझ का सहारा मिला है और सब इस हौसले के साथ बढ़ रही हैं कि पढ़-लिख कर कुछ बनना है। बड़ी बेटी पूजा वर्मा पढ़ने के खासी दूरी तय करके स्कूल जाती है, गांव समाज के कई तरह के ताने सुनता है परिवार, लेकिन मां उर्मिला देवी का मजबूत साथ बेटियों को आगे बढ़ने का बल देता रहता है।

बलरामपुर के रानीजोत गांव की उर्मिला देवी की पांच बेटियां हैं और इनकी पढ़ाई जारी रखने की जद्दोजहद में पूरे परिवार को पड़ोसियों तरह तरह के ताने लगातार सुनने पड़ते हैं। मां उर्मिला खुद भले ही निरक्षर हों लेकिन बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाने की उनकी समझ और जिद काबिले तारीफ है।

आज पूजा इस बात को हंसते हुए बताती है कि पड़ोस की औरतें ही पहले आकर मां से पंचायत करती थीं कि लड़कियों को क्या पढ़ाना, आगे चलकर चौका-बर्तन ही तो करना है इन्हें। शादी करो और फारिग होओ जिम्मेदारी से। लेकिन मां उर्मिला ने सबको हमेशा यही जवाब दिया कि जबतक बेटियां पढ़ना चाहेंगी, हम पढ़ाएंगे। पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती है पूजा कि हम बहनें पढ़-लिख कर माता-पिता का नाम रोशन करेंगी।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी श्वेता तिवारी ने पूजा और उसकी मां उर्मिला देवी से बात करके यह वीडियो कथा अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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खुद आगे बढ़ी और घर की मददगार बनी संजना | स्मार्ट बेटियां
खुद आगे बढ़ी और घर की मददगार बनी संजना | स्मार्ट बेटियां

संजना ने खुद को सबल बेटी के रूप में स्थापित किया ही, साथ ही अपने परिवार के लिए मजबूत मददगार भी साबित हुई। निराशा को दरकिनार करके संजना ने लगातार अपने हालात को बदलने का संघर्ष किया है और आज वह बीटीसी करने की तैयारी करते हुए अपने छोटे भाई और बहन को बेहतर शिक्षा दिला रही है। एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाकर अपने परिवार की मददगार बेटी बन आगे बढ़ रही है।

बलरामपुर के रेहरा बाजार ब्लॉक के नवाकोल गांव की संजना के परिवार के आर्थिक हालात ऐसे नहीं थे कि इंटर के बाद भी उसकी पढ़ाई जारी रह पाती। लेकिन जिद की पक्की संजना ने एनटीटी का कोर्स किया और एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हुए अपने छोटे भाई और बहन की शिक्षा जारी रखने के लिए संसाधन भी जुटाए। बीटीसी करके वह सरकारी स्कूल में पढ़ाना चाहती है और इसके लिए तैयारी भी कर रही है। भाई-बहन को भी वह बेहतर शिक्षा दिलवा कर इतना आगे बढ़ाना चाहती है कि वे भी अच्छी नौकरी पा सकें और सब मिलकर परिवार का नाम रौशन कर सकें।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी गरिमा सिंह ने संजना से विस्तार से बात करके यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।
अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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पड़ोसी दादाजी की मदद से रुकवाई शादी, बीटीसी कर रही है अर्चना | स्मार्ट बेटियां
पड़ोसी दादाजी की मदद से रुकवाई शादी, बीटीसी कर रही है अर्चना | स्मार्ट बेटियां

बलरामपुर के नयानगर गांव की अर्चना की अपना विवाह रोकने की जिद जब पिता से न जीत पाई तो उसने बिना देर किए पड़ोस के दादाजी यानी कन्हैया लाल वर्मा की मदद लेने की जुगत बिठाई। दादाजी ने आकर अर्चना के पिता राजेन्द्र प्रसाद वर्मा से लंबी बात की और कामयाब हुए। संयुक्त परिवार की बेटी की बात तो मां के अलावा किसी को समझ में न आई पर पड़ोसी बुजुर्ग की समझाइश अर्चना के सपनों में रंग भरने के काम आ गई। अर्चना अब बीटीसी की पढ़ाई कर रही है।

इंटर में पढ़ रही अर्चना के विवाह के लिए पिता राजेन्द्र वर्मा ने तैयारी शुरू कर दी थी। अपनी मां को किसी तरह से राजी करने में कामयाब हुई अर्चना की अपील पिता की अदालत में जाकर गिर गई। मां-पिता, चाचा-चाची और दादा-दादी वाले संयुक्त परिवार में अर्चना की आवाज दब गई। लेकिन धुन की पक्की अर्चना ने पड़ोसी बुजुर्ग की मदद ली और अपनी शादी रुकवाने में सफल रही।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी नीलम वर्मा ने अर्चना और मददगार पड़ोसी कन्हैया लाल वर्मा जी से बात की और उसकी वीडियो स्टोरी बनाकर अमर उजाला से साझा की।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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पिता और सहेलियों की मदद से गुंजन ने बृजरानी को बचाया | स्मार्ट बेटियां
पिता और सहेलियों की मदद से गुंजन ने बृजरानी को बचाया | स्मार्ट बेटियां

बृजरानी की पढ़ाई आठवीं के बाद रुकने वाली थी और उसका बाल विवाह भी हो ही जाता अगर उसकी दोस्त गुंजन त्रिपाठी और उसकी सहेलियों ने मिलकर बृजरानी की हर तरह से मदद न की होती। गुंजन ने अपने पिता से कहकर बृजरानी का नवीं में एडमिशन कराया और फिर सब सहेलियों ने मिलकर अपने जेबखर्च से पैसे बचा कर बृजरानी की फीस भरने का सिलसिला शुरू किया। गुंजन के पिता ने शुरुआती आर्थिक मदद तो की ही, साथ ही बृजरानी के परिवार वालों को इस बात के लिए भी राजी किया कि उसे पढ़ने दें और उसका बाल विवाह न करें। किशोरी सशक्तीकरण के लिए सबके सहयोग की एक मिसाल है यह कहानी।

इस कहानी की मुख्य किरदार है बलरामपुर के दरदहवा गांव की गुंजन। वह आज स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी है और इंटरनेट साथी के रूप में उसी ने इस वीडियो कथा को बनाकर भेजा है। लेकिन बरसों पहले जब उसने आठवीं की ही थी, तभी उसने जिद करके बृजरानी की मदद के लिए पिता समेत अपनी सहेलियों को जुटाया था और बाद में भी लगातार बृजरानी की मदद के लिए सजग रही।

सही वक्त पर बृजरानी की शादी हुई और उसके पति ने भी आगे पढ़ाई जारी रखने में उसे हर तरह से प्रोत्साहित किया। स्नातक करके बृजरानी आज एक स्कूल में पढ़ा रही है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | चौदह बरस की निशा ने लड़ी परिवार से जंग
स्मार्ट बेटियां | चौदह बरस की निशा ने लड़ी परिवार से जंग

निशा की उम्र महज चौदह साल है। वह सही मायने में बच्ची ही है। लेकिन इस बच्ची ने ऐसा काम कर दिखाया कि आज उसका स्कूल, उसका गांव और उसकी सहेलियां-- सब उसकी तारीफ कर रहे हैं। निशा पैगापुर गांव में रहती हैं। कुछ समय पहले उन्हें पता लगा कि उनके घर में सब किसी की शादी की तैयारी में व्यस्त हैं। उसने सबसे पूछा। पहले तो परिवार वाले कुछ नहीं बोले, फिर बताया कि तुम्हारी ही शादी की तैयारी है।

निशा ने खुद अपनी कहानी बताते हुए कहा कि उसकी मां और परिवार के सब लोग उसकी बात सुनने को तैयार नहीं थे। उसने बहुत कहा कि मैं अभी शादी नहीं करना चाहती, लेकिन किसी पर कोई असर नहीं हुआ। हारकर उसने अपने स्कूल टीचर को अपने संकट के बारे में बताया। टीचर ने सोच-विचार कर निशा के गांव के प्रधान से बात की। बाद में टीचर और ग्राम प्रधान दोनों मिलकर निशा के घर गए। उसके मां-बाप को समझाया। तब जाकर निशा के घर वाले कुछ पसीजे।

फिलहाल निशा की शादी टल गई है। उसका इरादा मजबूत है कि वह अपनी पढ़ाई पूरी होने तक ब्याह नहीं करेगी। लेकिन निशा ने बहुत कम उम्र में एक बड़ी जंग जीत ली है। बीमार परंपरा से जंग। अब निशा एक मिसाल है। बलरामपुर की हजारों बेटियां अब निशा को देखकर प्रेरणा पा रही हैं।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी ने श्वेता मिश्रा ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | जिठानी के लड़के को बचाया बाल विवाह से
स्मार्ट बेटियां | जिठानी के लड़के को बचाया बाल विवाह से

लक्ष्मी मजबूर थीं और बचपन में अपने खुद के ब्याह को रोक नहीं पाईं। लेकिन जब आंखें खुलीं तो पता चला कि बहुत कुछ खो गया। फिर वे महिला समाख्या संगठन से जुड़ीं और अब अपने गांव-देहात में सुनिश्चित कर रहीं हैं कि जिस हद तक हो सके, बाल विवाहों को रोका जाए।

बलरामपुर के तुलसीपुर ब्लॉक में निवोरिया गांव की लक्ष्मी बड़े चाव के साथ अपनी आपबीती बताती हैं। उन्होंने बताया कि उनकी जेठानी अपने केवल 14 साल के लड़के को शादी के बंधन में बांधने का मन बना चुकी थीं। लेकिन जब उन्हें पता चला तो उन्होंने जेठानी का ह्रदय परिवर्तन करने की ठान ली। वे कई बरस से महिला समाख्या के साथ मिलकर बाल विवाह के खिलाफ लोगों को समझा रही हैं। लिहाजा अपने ही घर में वह यह अत्याचार होते नहीं देख सकतीं थीं। उन्होंने एक के बाद एक कई बैठकें अपनी जेठानी के साथ कीं। उन्हें हर तरह से समझाया।

लक्ष्मी की मेहनत रंग लाई। उनकी जेठानी को बाल विवाह के खतरे समझ आ गए। उन्होंने शादी टाल दी। अब लक्ष्मी का भतीजा स्कूल में पढ़ रहा है

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी हेमलता ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | अपने तर्क काम न आये, तो स्कूल का सहारा लिया प्रीति ने
स्मार्ट बेटियां | अपने तर्क काम न आये, तो स्कूल का सहारा लिया प्रीति ने

नवीं में पढ़ रही प्रीति ने जब माता-पिता से अपना बाल विवाह न करने की बात कही तो उन्होंने बात मानने से इनकार कर दिया। लेकिन स्कूल में हुई चर्चा के आधार पर जब दोबारा प्रीति ने मां से बात की तो बाल विवाह के खतरे और उससे उन्हीं की बेटी के जीवन पर आने वाले संकट की बात उनके गले उतर गई। बाद में पिता भी मान गये। आज प्रीति खुशी और भरोसे के साथ दसवीं में पढ़ रही है।

श्रावस्ती के इकौना ब्लॉक के जानकीनगर गांव की प्रीति को पता था कि बाल विवाह न केवल कानूनन गलत है बल्कि उसके अपने जीवन के लिए भी नुकसानदेह है। घर में जब उसने अपने विवाह की चर्चा सुनी तो अपनी समझ के बल पर माता-पिता को बाल विवाह न करने के लिए मनाने की कोशिश की। उसकी बात को हवा में उड़ा दिया घर वालों ने। तब उसने इस बारे में स्कूल में चर्चा की और अपनी समझ और तर्कों को और धार दी। दोबारा जब उसने स्कूल में हुई चर्चा को घर वालों के सामने रखा तो मसले की गंभीरता पर गौर किया गया। कम उम्र में मां बनने से मां और बच्चे के जीवन पर आने वाले संकट की बात उन्हें समझ में आई और अपनी बेटी को इस अंधे कुएं में झोंकने से रुक गये प्रीति के माता-पिता।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी अनीता सिंह ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | बाल विवाह से बची तो पढ़ाई भी जारी रख पाई प्रीति
स्मार्ट बेटियां | बाल विवाह से बची तो पढ़ाई भी जारी रख पाई प्रीति

प्रीती आज जब बोलती है कि “हमारी शादी भी रुक गयी और हम बीए की पढ़ाई भी कर रही हैं”, तो उसके चेहरे की खुशी देखते ही बनती है। प्रीती की पढ़ाई इंटर में रोक दी गयी। शादी करके अपने घर जाओ, यह कहकर घर वालों ने आगे पढ़ने की जरूरत को खारिज कर दिया। तब प्रीती अड़ गयी कि आगे पढ़ाओ या न पढ़ाओ, लेकिन अभी 17 बरस की उम्र में शादी नहीं करूंगी। उसकी इस जिद को परिवार वाले किसी तरह मान गये। एक बार बाल विवाह से बच गयी तो प्रीती ने धीरे-धीरे आगे की पढ़ाई के लिए भी घर वालों को राजी कर ही लिया।

शुरू में प्रीती को अपने पिता को इस बात के लिए राजी करने में ही काफी जोर लगाना पड़ा कि इंटर के दौरान ही उसका विवाह न कर दिया जाए। बलरामपुर के पचपेड़वा ब्लॉक के विशुनपुर गांव की प्रीती के पिता का तो सीधा सा तर्क था कि ज्यादा पढ़ कर भी क्या अलग करना है, “अब तुम्हारी शादी करते हैं और तुम अपने घर जाओ”।  अपने व्यक्तित्व विकास के और तरीकों पर भी काम करते हुए प्रीती ने खुद को हुनरमंद बनाने के तरीके खोजे और अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ाने पर भी उसने ध्यान देना शुरू किया। कुछ उसके बाद उसने जिद पकड़ी कि अभी आगे पढ़ना है। प्रीती की खुशी उसके चेहरे से छलकती है क्योंकि वह उच्च शिक्षा के पायदान पर खड़ी होकर आगे बढ़ने के सपने देख पा रही है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी सुषमा ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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खुद अनपढ़, पति किसान, पर बच्ची को पढ़ाने का प्रण | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
खुद अनपढ़, पति किसान, पर बच्ची को पढ़ाने का प्रण | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

मालती वर्मा खुद स्कूल नहीं जा पाईं। कभी किताबों का मुंह नहीं देखा। पति किसान हैं और गृहस्‍थी मुश्किल से चलती है। लेकिन एक बात उन्होंने गांठ बांध रखी है -- बिना शिक्षा के कोई आगे नहीं बढ़ सकता और मेरा बेटा और बेटी दोनों पूरी शिक्षा हासिल करने के बाद ही विवाह करेंगे।

बलरामपुर जिले के अचलपुर चौधरी गांव की निवासी मालती बताती हैं कि एक जमाना था जब उनका बस एक ही सपना था। बस, किसी तरह दोनों बच्चों का दाखिला स्कूल में हो जाए। पड़ोसियों के बच्चों को स्कूल जाते देखती थीं। फिर एक दिन सपना साकार हुआ। आज मालती की बेटी ग्यारह बरस की है और वह कहती हैं कि बिटिया अठारह साल की उम्र तक पढ़ाई करेगी। उसके बाद ही शादी की सोचेंगे।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी सुधा वर्मा ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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बहन का हश्र देख बेटी का जीवन संवारा सर्वजीत ने | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां
बहन का हश्र देख बेटी का जीवन संवारा सर्वजीत ने | बड़े बदलाव की छोटी कहानियां

सर्वजीत ने बाल विवाह और अशिक्षा का कहर अपनी आंखों से अपनी बहन के जीवन पर टूटते देखा। बहन का हश्र देखकर वे इतना सहम गए कि उन्होंने अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाने का संकल्प कर लिया। सोनपुर के ग्राम सुखरापुर के निवासी सर्वजीत सिंह अपनी बहन की बात करते हुए संजीदा हो जाते हैं। वे कहते हैं कि बचपन के दिन अच्छी तरह याद हैं। स्कूल गांव से बहुत दूर था और गरीबी की मार थी। बहन को पढ़ा-लिखा नहीं पाए और कम उम्र में ही उसकी शादी कर दी। पति शराबी निकला और जल्दी ही बीमारी से मर गया। अब बहन अकेली रह गई थी। पढ़ी लिखी थी नहीं। चारों ओर अंधेरा छा गया। बड़ी मुश्किल से अब आशा वर्कर की नौकरी मिली।

सर्वजीत कहते हैं कि जब भी बहन को देखता था तो अपनी बेटी का चेहरा सामने आ जाता। डरता था कि कहीं उसका हश्र भी बहन जैसा न हो। इसलिए कभी बेटी की पढ़ाई के साथ समझौता नहीं किया। उसे बीएससी तक पढ़ाया। दो छोटे बेटे भी हैं जो हाई स्कूल में पढ़ रहे हैं। बेटी अब तरक्की की राह पर है और अब मन में कोई आशंका नहीं है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी गुरप्रीत ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले में एक अभियान चला रहा है। इसके तहत 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | कच्ची कलियों को कुचलने से बचाता है यह शिक्षामित्र
स्मार्ट बेटियां | कच्ची कलियों को कुचलने से बचाता है यह शिक्षामित्र

शिक्षामित्र अध्यापक संतराम वर्मा ने अपने गांव और कर्मक्षेत्र में समाज के बीच लगातार संवाद करके बाल विवाह के खिलाफ माहौल बनाया और धीरे धीरे लोगों का मन बदलने में सफलता हासिल की है। आज वह खुशी के साथ यह कह पाते हैं जहाँ वे पढ़ाते हैं उस अपने गांव परसोहना (जिला श्रावस्ती) में अभिभावकों को बाल विवाह के खतरों से आगाह करने में उन्होंने खासी सफलता पाई है।

शिक्षक होने के नाते समाज में काफी लोगों से संवाद होने की सुविधा का पूरा लाभ लेते हैं संतराम। उनकी बात को गांव के लोगों ने भी ठीक तरह से समझा और अपनी बेटियों के बाल विवाह से धीरे धीरे परहेज करना शुरू किया।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी दीप्ति श्रीवास्तव ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | एक बहन की तकलीफें देख दूसरी की जिंदगी बचाई
स्मार्ट बेटियां | एक बहन की तकलीफें देख दूसरी की जिंदगी बचाई

घर की बड़ी बेटी की शादी मात्र 16 साल की उम्र में ही हो गयी थी और इस बाल विवाह को बड़ा भाई बंशीलाल रोक नहीं पाया था। इसका गहरा मलाल था उसके मन में। लेकिन जब छोटी बहन अर्चना के भी बाल विवाह की नौबत आन पड़ी तो बंशीलाल ने दादा, चाचा और फिर पिता से जिद के साथ बात करके इसे रुकवाया। अर्चना की शादी तब हुई जब उसने 12वीं पास कर ली थी और उसकी उम्र 20 साल से ज्यादा थी। बड़ी बहन के मुकाबले आज अर्चना ज्यादा खुश है। उतना ही खुश बंशीलाल भी है।

बलरामपुर जिले के महुवा गांव के बंशीलाल बीते दुख को याद करते हुए कहते हैं—  घर की बड़ी बेटी की जब 16 साल की उम्र में पिताजी ने शादी तय की तो उस समय 21 साल का बंशी खुद भी पढ़ाई कर रहा था और उस बाल विवाह को रुकवाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। शादी के बाद का बहन का जीवन देख कर उसका दुख और बाल विवाह के खिलाफ संकल्प बढ़ता ही गया। इसलिए जब छोटी बहन अर्चना के लिए भी वही हालात बनने लगे तो बंशीलाल ने परिवार के बड़ों के सामने तर्क रखा कि क्या आपलोग अर्चना को शादी के बाद बीमार, चिंतित और दुखी देखना चाहते हैं। अपने मजबूत तर्कों के बल पर इस बाल विवाह को बड़ों की रजामंदी के साथ रुकवाने में सफल रहा बंशीलाल।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी रंजना ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | सेना में जाने का हौसला रखती है कसियापुर की अंकिता
स्मार्ट बेटियां | सेना में जाने का हौसला रखती है कसियापुर की अंकिता

पूरे आत्मविश्वास के साथ अंकिता मिश्रा आज कहती है कि अच्छी पढ़ाई करके वह सेना में जाना चाहती हूँ। “मां की मदद और पिताजी की रजामंदी से मैं आज बी.एस.सी. में पढ़ रही हूँ। गांव में खराब माहौल का रोना रोकर मेरी भी शादी जल्दी ही की जाने वाली थी, लेकिन मैंने अपनी बात मजबूती से मां के सामने रखी और उन्हें इस बात के लिए राजी कर सकी कि वे पिताजी से बात करके मेरी बाल विवाह रुकवायें और मुझे पढ़ने दें।”

अंकिता की बातों से समझ में आता है कि उसके गांव कसियापुर का माहौल भी बाल विवाह को लेकर काफी दकियानूसी रहा है। घर के आर्थिक हालात भी अच्छे नहीं रहे हैं। पिता का झुकाव तो जल्दी शादी कर देने का था  लेकिन अंकिता की मां ने जब कहा कि जैसे बेटे को पढ़ा रहे हैं हम, वैसे ही बेटी को भी पढ़ाना-बढ़ाना चाहिए तो अंकिता के पिता मान गये।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी राजकुमारी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।
अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | बेटा बनकर बहन को बचाया अंजुम बानो ने
स्मार्ट बेटियां | बेटा बनकर बहन को बचाया अंजुम बानो ने

छह बच्चियों के पिता की टीस थी कि खानदान चलाने को बेटा नहीं है। वे बीमार भी रहते थे। डर था कि उसे कुछ हो गया तो कौन बेटियों के हाथ पीले करेगा। लिहाजा जैसे-तैसे करके, एक के बाद एक  बेटियों का निकाह कच्ची उम्र में ही  पढ़वा रहे थे। बाप की गलतफहमियों को अंजुम बानो ने समझा और अपनी सबसे छोटी बहन को  छोटी उमर में गृहस्थी के बोझ से बचा लिया।

श्रावस्ती जिले के जमुनहा ब्लॉक के त्रिलोकपुर गांव में रहने वाली अंजुम बानो अपनी आपबीती सुनाती हैं। उन्होंने बताया कि अब्बा को डर था कि बीमारियां उन्हें वक्त से पहले दुनिया से छीन लेंगी और आखिरी बेटी कुंवारी रह जाएगी। लिहाजा, वे बिटिया की स्कूली तालीम पूरी होने का भी इंतजार नहीं करना चाहते थे। 

अंजुम को जब पता चला तो उसने मायके जाकर अब्बा को समझाने-बुझाने की ठानी। घर पहुंच कर अब्बा का हाथ अपने हाथ में लिया। उन्हें समझाया कि बेटे का हक हम पूरा करेंगी। अगर उन्हें कुछ हो भी गया तो बिटिया का ब्याह उसकी बड़ी बहनें मिलकर कराएंगी। अब्बा को तस्कीन हुई। जान में जान आई। उन्होंने बिटिया की शादी टाल दी।

अंजुम गर्व से बताती हैं। उनकी वही नन्ही बहन आज बीए सेकंड ईयर में पढ़ रही है। सेहतमंद है और खुश है। अंजुम बानो दरअसल स्मार्ट बेटियां अभियान से भी इंटरनेट साथी  के रूप में जुड़ी हुईं हैँ। उन्होंने ही अपनी एक वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान `स्मार्ट बेटियां` के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | बेटी को बोझ मानने की सोच का शिकार होने ही वाली थी गुंजन
स्मार्ट बेटियां | बेटी को बोझ मानने की सोच का शिकार होने ही वाली थी गुंजन

बेटी को बोझ मानने की मानसिकता के चलते  न तो बेटी के शारीरिक स्वास्थ्य की चिंता की जाती है और न ही मानसिक स्वास्थ्य की। इसी मानसिकता का शिकार हो जाती 15 की गुंजन भी, जब वह हाई स्कूल में पढ़ रही थी। श्रावस्ती के कोंडरी दीगर गांव की गुंजन के पिता उसके बचपन में ही गुजर गये थे और पांच भाई-बहनों को पालने की जिम्मेदारी तब से मां के ही कंधे पर रही है। आर्थिक दबाव के चलते मां भी एकबारगी उसका बाल विवाह करने को उतावली हो उठी थीं। लेकिन गुंजन की बार-बार की जिद के आगे वे अंततः झुक गयीं।

गुंजन ने मां के सामने बाल विवाह के सामाजिक पहलुओं को तो रखा ही, उसके साथ ही इससे जुड़े कानूनी और शारीरिक-मानसिक मुद्दे भी रखे। लंबी बातचीत के बाद मां ने गुंजन की बात को समझा और उसे आगे पढ़ने देने के लिए राजी हो गयीं। गुंजन के बार-बार के इसरार ने मां की दिल इस तरह जीत लिया कि वे कह उठीं कि गुंजन जब तक चाहे, पढ़े। आत्मविश्वास से भरी गुंजन अब अपने गांव-समाज के सभी लोगों से अपील करती है कि किसी भी कीमत पर बाल विवाह न करें।
स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी निशा देवी ने गुंजन से बात करके यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | पिता की समझदार जिद की छाया में बढ़ रहे हैं बच्चे
स्मार्ट बेटियां | पिता की समझदार जिद की छाया में बढ़ रहे हैं बच्चे

सात बेटों और दो बेटिओं के पिता लालमणि विश्वकर्मा ने अपनी बड़ी बेटी की शादी 18 साल की उम्र में ही की थी। लेकिन उसे भी अपनी दसवीं की पढ़ाई पूरी करने में जो दिक्कतें आईं, उससे सबक लेते हुए उन्होंने तय किया कि छोटी बेटी की शादी तभी करेंगे जब वह अपनी पढ़ाई पूरी करके खुद के पैरों पर खड़ी हो जायेगी।

लालमणि श्रावस्ती के सिरसिया ब्लॉक के दुधवनिया गांव के निवासी हैं और गांव की शिक्षा समिति के अध्यक्ष भी हैं। सोच काफी सुलझी हुई है उनकी। जिंदगी के अनुभवों ने उन्हें बाल विवाह के खिलाफ और जिद्दी बना दिया है। बाल विवाह से होने वाली पेचीदगियों को वे अच्छे से पहचानते हैं। उनकी छोटी बेटी दसवीं में पढ़ रही है और इस समय 17 साल की है। बेटे-बेटियों में कोई फर्क किये बिना लालमणि सबको अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए संकल्पित हैं।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी रश्मि ने लालमणि विश्वकर्मा से बात करके यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | गली-गांव के तानों से जूझकर सरिता आगे बढ़ती रही
स्मार्ट बेटियां | गली-गांव के तानों से जूझकर सरिता आगे बढ़ती रही

गांव वालों के तानों और घर वालों के शुरुआती विरोध के बावजूद सरिता ने अपना बाल विवाह रुकवा लिया और पढ़ाई रुकने न दी। बी.ए. अंतिम वर्ष में पढ़ रही सरिता ने विरोध न किया होता तो उसकी शादी 9वीं क्लास में ही हो गयी होती।

तीन बड़े भाइयों-भाभियों वाले खासे बड़े परिवार में सरिता ने जब पढ़ाई के लिए अपना बाल विवाह रुकवाने की जिद ठानी तो शुरू में परिवार के सभी लोग नाराज हो गये। श्रावस्ती जिले के डौराबोझी गांव की सरिता ने बिना घबराये अपनी बात कहना जारी रखा और पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही शादी करने की जिद दोहराती रही। आखिरकार घर वालों को उसकी बात के गंभीर मायने समझ में आये और यों उसके आगे बढ़ने के सफर पर लगने वाला पूर्णविराम हट गया। फिर भी, जब सरिता विद्यालय जाने के लिए घर से निकलती थी तो गली-गांव के लोगों के दबी जुबान के ताने तो पीठ पीछे सुनने को मिलते ही थे। उनकी परवाह किये बगैर वह बढ़ती गयी। प्राथमिक स्कूल में शिक्षिका बनने का सपना संजोये सरिता बी.ए. की पढ़ाई पूरी करने में जुटी है।

स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी रानू देवी ने सरिता से बात करके यह वीडियो कथा बनाई है।

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स्मार्ट बेटियां | अपनी प्रतिभा तराश आगे बढ़ने की राह पर दिव्या
स्मार्ट बेटियां | अपनी प्रतिभा तराश आगे बढ़ने की राह पर दिव्या

गांव में माहौल ठीक न होने के तर्क की ढाल के सहारे लखाईखास गांव में भी बेटियों की शादी 13-16 साल में कर दी जाती रही है। बड़ी बहन की तरह ही दिव्या मिश्रा का भी यही हश्र होने वाला था। संगीत और गृह सज्जा में थोड़ा-बहुत दखल रखने वाली दिव्या ने किसी तरह से 12वीं की पढ़ाई के दौरान ही हो रही अपनी शादी रुकवाई। आज वह बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा के रूप में अपने सपने सच करने की राह पर बढ़ रही है।

श्रावस्ती के जमुनहा ब्लॉक के लखाईखास गांव की दिव्या अच्छी पढ़ाई करके शिक्षिका बनना चाहती है। इस राह पर आगे बढ़ने की चुनौती पिछले साल एकाएक बहुत बड़ी हो गई थी जब उसे पता चला कि माता-पिता उसकी भी शादी करने की बात कर रहे हैं। देश सेवा का हौसला रखने वाली दिव्या ने अपने अभिभावकों को समझाने की पुरजोर कोशिश की कि वह बाल विवाह करवा कर अपने जीवन से खिलवाड़ नहीं होने देना चाहती, पढ़-लिख कर आगे बढ़ना चाहती है। उसके तर्क जीत गए।
स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी सुमन देवी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।

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स्मार्ट बेटियां | सब जतन किये बाल विवाह के खिलाफ तर्कों को बल देने को
स्मार्ट बेटियां | सब जतन किये बाल विवाह के खिलाफ तर्कों को बल देने को

बेटियों के तर्क आसनी से माता-पिता के गले नहीं उतरते। और अगर बात बाल विवाह रोकने की हो, तब को यह जिद और कड़ी हो जाती है। अपने माता-पिता की ऐसी की कठिन जिद से पार पाने के लिए 11वीं में पढ़ रही 15 साल की कोमल को बाल विवाह से होने वाले शारीरिक मानसिक नुकसानों की फेहरिस्त को अपने स्कूल की शिक्षा में मिली जानकारी के तौर पर घर में पेश करना पड़ा। यह तकनीक काम आई और कोमल का बाल विवाह रुक गया।

सिलाई सीखने के साथ ही 12 वीं में पढ़ रही कोमल ने जब बाल विवाह के खिलाफ बातों को केवल अपने तर्क के तौर पर मां के सामने रखा तो उन्होंने उसे खास तवज्जो नहीं दी। उन्होंने माना कि नासमझ लड़की बेसिरपैर की बातें कर रही है। अपनी जिद पर अड़ी कोमल ने जब कहा कि उसके स्कूल की टीचर ने भी बार बार इन बातों को बताया है, तब जाकर घर वाले कोमल की बातों पर विचार करने को तैयार हुए। फिर भी इस गुंजाइश  को पक्के निर्णय में तब्दील करने के लिए कोमल को काफी मेहनत करनी पड़ी। कोमल के इस संकल्प की वीडियो कथा बनाई है स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी अनीता सिंह ने।

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सोशल साइट्स का उपयोग करने में बरतें सावधानी | डॉ. अजय पाल शर्मा | पुलिस की पाठशाला
सोशल साइट्स का उपयोग करने में बरतें सावधानी | डॉ. अजय पाल शर्मा | पुलिस की पाठशाला

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से मंगलवार, 30 अक्टूबर, 2018 को ग्रेटर नोएडा के सिग्मा वन स्थित होली पब्लिक स्कूल में पुलिस की पाठशाला का आयोजन किया गयाl पाठशाला में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. अजय पाल शर्मा, विद्यार्थियों से मुखातिब होते हुए बताया कि पुलिस की कार्यशैली और व्यवहार को पहले से बेहतर करने का प्रयास किया गया हैl 

पुलिस की कार्यप्रणाली के बारे में बताते हुए एसएसपी ने बच्चों को किसी भी परेशानी में बेहिचक पुलिस की मदद मांगने के लिए प्रेरित कियाl उन्होंने छात्रों को विभिन्न उपयोगी हेल्पलाइन नंबरों जैसे; डायल-100, वूमेन पॉवर लाइन-1090 आदि कार्यप्रणाली के बारे भी बतायाl

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स्मार्ट बेटियां | बेटी की जिद को मिला मां का साथ, बढ़ चली किरन
स्मार्ट बेटियां | बेटी की जिद को मिला मां का साथ, बढ़ चली किरन

बेटी की जिद को आखिरकार मां का साथ मिला। मां ने बेटी का दर्द समझा और उसे आगे पढ़ने देने के हालात बनाए। और यों श्रावस्ती के शाहपुर बरगदवा गांव की किरन डॉक्टर बनने के सपने को सच करने की राह पर आगे बढ़ती जा रही है।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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स्मार्ट बेटियां | जिद न करती तो प्रतिभा की प्रतिभा दबी रह जाती
स्मार्ट बेटियां | जिद न करती तो प्रतिभा की प्रतिभा दबी रह जाती

वकील पिता की बेटी प्रतिभा की प्रतिभा दबी ही रह जाती अगर उसने जिद न ठानी होती। कुछ बनकर अपने माता-पिता का नाम रौशन करने की जिद ठाने प्रतिभा 12 किमी साइकिल चलाकर 12वीं क्लास की पढ़ाई के लिए अपने विद्यालय जाती है। श्रावस्ती के शाहपुर बरगदवा गांव की प्रतिभा स्टाफ नर्स बनना चाहती है। प्रतिभा के संकल्प और सवालों की वीडियो कथा बनाई है स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी मालती देवी ने।

अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा  अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।

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नज़रिया | इसरो के बेजोड़ मिशन: बीते कल और आने वाले कल की झलक | अमर उजाला फाउंडेशन
नज़रिया | इसरो के बेजोड़ मिशन: बीते कल और आने वाले कल की झलक | अमर उजाला फाउंडेशन

भारत के खास अंतरिक्ष मिशनों की याद दिलाते हुए इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक इम्तियाज़ अली खान ने आने वाले दिनों में इसरो के बेजोड़ मिशनों की विशेषताओं को बताया। पांच देशों के पे-लोड ले जाने वाले चंद्रयान मिशन और चन्द्रमा पर रोवर उतार कर शोध करने की तैयारी की चर्चा की। स्पेस माइनिंग से प्लैटिनम (सोने से भी महंगी धातु) और हीलियम के खनन की संभावनाओं और स्पेस टूरिज्म की अंतरिक्षी उड़ान की जानकरी दी, 26 मई, 2018 को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक सेंटर में आयोजित अमर उजाला फाउंडेशन के खास कार्यक्रम ‘नज़रिया- जो जीवन बदल दे’ में।

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